logo

छठव्रतियों ने अस्ताचलगामी सूर्य को विभिन्न छठ घाटों पर अर्घ्य दिया, भारी भीड़ उमड़ी

2650news.jpg
द फॉलोअप टीम, रांची:
लोक आस्था के महापर्व छठ के तीसरे दिन शुक्रवार को छठव्रतियों ने अस्ताचलगामी सूर्य को विभिन्न छठ घाटों पर अर्घ्य दिया। छठ के मौके पर रांची के विभिन्न तालाबों, नदियों, डैम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। इस दौरान छठव्रती महिलाएं और पुरुष नदी, तालाब सहित विभिन्न जलाशयों में पूजन सामग्री के साथ पहुंचे। शनिवार को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ महापर्व का समापन होगा।  

तांबे के लोटे से सूर्य को जलाभिषेक करें
पंडित राकेश उपाध्याय के अनुसार छठ के दौरान सूर्य की पूजा करते हुए: ऐही सूर्यदेव सहस्त्रांशो तेजो राशि जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणार्ध्य दिवाकर:।। ऊँ सूर्याय नम:, ऊँ आदित्याय नम:, ऊँ नमो भास्कराय नम:। अर्घ्य समर्पयामि.... का जाप बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि सूर्य को जलाभिषेक के लिए तांबे के लोटे का उपयोग करना चाहिए। जल चढ़ाते समय सूर्य को सीधे नहीं देखना चाहिए। गुड़ का दान करना चाहिए। गिरते जल की धारा में सूर्यदेव का दर्शन करना चाहिए।

अर्घ्य सूर्य को पर, पूजा छठी मइया की 
छठ पर्व की पूजा के दौरान पूजन विधान में शास्त्र के नियमों का बंधन नहीं है। व्रत करनेवाले छठ में अर्घ्य सूर्य को देते हैं लेकिन पूजा छठी मइया की करते हैं। इसके पीछे का तर्क यह है कि प्रकृति देवी के एक प्रमुख अंश को देवसेना कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक प्रचलित नाम षष्ठी है। यही स्थानीय बोली में छठी मइया हैं। छठ की बड़ी खासियत यह भी है कि इसमें उगते सूर्य को तो जल अर्पण करते ही हैं, डूबते सूर्य को भी अर्घ्य देते हैं। यह आध्यात्मिक ताकत का प्रतीक है। 

छठ में पुरोहित की कोई परंपरा नहीं 
छठ लोक यानी जन आस्था का पर्व है। यह पूरे समाज को अलग-अलग रूप से जोड़ता है। इसमें सबकी भागीदारी तय करती है। इस पर्व में पुरोहित की कोई परंपरा नहीं है। व्रती सीधे छठी मइया से जुड़ते हैं। सीधे भगवान सूर्य से जुड़ते हैं। कोई मंत्र भी नहीं होता। 

छठ पर्व में टूट जाता है जाति बंधन 
यह एकमात्र त्योहार है, जिसमें ऊंची-नीची जाति के भेद खत्म करने के साथ ही, हिंदू-मुस्लिम की दूरी भी खत्म हो जाती है। हर वर्ग पूरी आस्था के साथ छठ पर्व में शामिल होता है। समाज में जिस वर्ग को अछूत बनाकर रखा गया है, वही छठ के लिए सूप-डलिया आदि बनाते हैं। इसके अलावा कुम्हार के हाथों मिट्टी के चूल्हे पर छठ के प्रसाद बनाए जाते हैं। कलश व दीप वहीं से आते हैं। इस पर्व में धार्मिक सीमाएं भी टूटती हैं। अलग पंथ व संप्रदाय के लोग भी इस त्योहार के लिए पूजन सामग्री बड़े पैमाने पर बेचते ही नहीं बल्कि कई सामाजिक संगठन फल-दूध आदि का वितरण भी करते हैं। इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता शुद्धता व अनुशासन है। छठ घाट पर किसी भी व्रती से प्रसाद लेने में किसी को हिचकिचाहट नहीं होती। प्रसाद लेने के बाद पैर छूकर आशीर्वाद लेने की भी परंपरा है। इसमें भी किसी को यह अभिमान नहीं रहता कि वह किसी ऊंची जाति से है।