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पहिली राजा के रंग में रंगा ओडिशा, झूले, पीठा और लोक परंपराओं से गूंजा पूरा राज्य

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द फॉलोअप डेस्क 
ओडिशा का प्रसिद्ध कृषि एवं सांस्कृतिक पर्व ‘राजा’ पूरे राज्य में पारंपरिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। तीन दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के पहले दिन ‘पहिली राजा’ के अवसर पर गांवों से लेकर शहरों तक उत्सव का माहौल देखने को मिला। महिलाओं, युवतियों और बच्चों ने नए वस्त्र पहनकर, झूलों का आनंद लेकर तथा पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद चखकर इस लोकपर्व का स्वागत किया।
गौरतलब है कि ओडिशा का प्रसिद्ध लोक एवं कृषि पर्व ‘राजा’ 14 जून से शुरू होकर 16 जून तक मनाया जा रहा है, जबकि 17 जून को बसुमती स्नान के साथ इसका पारंपरिक समापन होगा। तीन दिनों तक चलने वाला यह उत्सव धरती माता, नारी शक्ति और मानसून के आगमन का प्रतीक माना जाता है। ‘पहिली राजा’, ‘मिथुन संक्रांति’ और ‘सेसा राजा’ के दौरान पूरे राज्य में झूले, लोकगीत, पारंपरिक खेल, पान और पोड़ा पीठा समेत विभिन्न प्रकार के पीठा इस पर्व की खास पहचान बनते हैं। इस दौरान खेती-बाड़ी के कार्य रोक दिए जाते हैं और महिलाएं व युवतियां नए वस्त्र पहनकर उत्सव में भाग लेती हैं। गांवों से लेकर शहरों तक मनाया जाने वाला यह पर्व ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक एकता और पारंपरिक जीवन शैली को जीवंत रूप से प्रदर्शित करता है।

नारी शक्ति और कृषि संस्कृति के सम्मान के रूप में मनाया जाता है

ओडिशा में राजा पर्व को धरती माता, नारी शक्ति और कृषि संस्कृति के सम्मान के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दौरान धरती माता विश्राम करती हैं, इसलिए खेती-बाड़ी और भूमि से जुड़े कार्य रोक दिए जाते हैं। यह पर्व मानसून के आगमन और नई कृषि ऋतु की शुरुआत का भी प्रतीक माना जाता है।  राज्य के विभिन्न जिलों में ‘राजा झूला’ लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। बरगद, आम और अन्य बड़े पेड़ों पर लगाए गए झूलों पर युवतियां पारंपरिक राजा गीत गाते हुए झूलों का आनंद ले रही हैं। गांवों में बच्चों और युवाओं के बीच रस्सी कूद, पुची, बागुडी (स्थानीय कबड्डी) और अन्य पारंपरिक खेलों की भी धूम है।

सबसे बड़ी पहचान पारंपरिक ओड़िया व्यंजन
राजा पर्व की सबसे बड़ी पहचान पारंपरिक ओड़िया व्यंजन और विशेष रूप से ‘पीठा’ हैं। घर-घर में पोड़ा पीठा, मंडा पीठा, काकेरा पीठा, अरिशा पीठा और नारियल तथा सूजी से बने विभिन्न प्रकार के पीठा तैयार किए जा रहे हैं। लकड़ी के चूल्हों पर बनाए जा रहे इन व्यंजनों की खुशबू पूरे उत्सव को और खास बना रही है। कई स्थानों पर पीठा निर्माण प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया गया, जिसमें महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
कटक, जगतसिंहपुर, पुरी, खुर्दा, जाजपुर, केंद्रपाड़ा, बारीपदा, बालासोर और अन्य जिलों में राजा महोत्सव समितियों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक खेलकूद प्रतियोगिताएं और लोक कला प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं। महिलाओं और युवतियों के लिए अलता-कुमकुम, राजा क्वीन और पारंपरिक परिधान प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया गया है।

ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक
बुजुर्गों का कहना है कि राजा पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। बदलते समय में आधुनिक जीवनशैली के बीच यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, लोक परंपराओं और सामुदायिक मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।
राज्यभर में मनाए जा रहे इस उत्सव ने एक बार फिर ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया है। झूले, लोकगीत, पारंपरिक खेल, स्वादिष्ट पीठा और सामुदायिक मेल-मिलाप के बीच ‘पहिली राजा’ ने लोगों के जीवन में खुशियां और उत्साह भर दिया है। आगामी दिनों में मिथुन संक्रांति और सेसा राजा के साथ यह पर्व और अधिक रंगारंग रूप में मनाया जाएगा।

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