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जमशेदपुर के इंजीनियर अंश त्रिपाठी की तकनीकी सूझबूझ से ‘शिवालिक’ ने पार किया दुनिया का सबसे खतरनाक समुद्री रास्ता

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द फॉलोअप डेस्क
मिडिलइस्ट में बढ़ते तनाव और भीषण युद्ध के बीच, जब समुद्र का हर रास्ता जोखिम से भरा था, तब झारखंड के जमशेदपुर का एक युवा इंजीनियर मौत के साये में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा था। यह कहानी है लौहनगरी के अंश त्रिपाठी की, जिसने न सिर्फ एक विशाल जहाज शिवालिक को संभाला, बल्कि 46 हजार मीट्रिक टन एलपीजी से लदे मिशन को सुरक्षित भारत तक पहुंचाया। शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया का जहाज ‘शिवालिक’ जब दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहा था, तब हर पल खतरे का था। लेकिन सेकंड इंजीनियर के रूप में तैनात अंश त्रिपाठी ने तकनीकी मोर्चे पर कोई चूक नहीं होने दी। 13 मार्च को जहाज ने इस खतरनाक रास्ते को सफलतापूर्वक पार किया और कल शाम जहाज गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर सुरक्षित लंगर डाल चुका है।


जैसे ही विशालकाय जहाज 'शिवालिक' गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह की सीमा में पहंचा और उसे नेटवर्क मिला। अंश त्रिपाठी ने सबसे पहले अपनी मां चंदा त्रिपाठी को फोन किया। यह वह पल था, जिसका इंतजार पूरा परिवार पिछले कई दिनों से सांसें रोककर कर रहा था। अंश ने कम शब्दों में, लेकिन पूरी मजबूती के साथ अपनी बात कही, बोले- मां, मैं भारत पहुंच गया हूं और पूरी तरह सुरक्षित हूं। अभी जहाज के कुछ तकनीकी कामों में व्यस्त हूं, जैसे ही फ्री होता हूं, विस्तार से बात करूंगा। अंश के ये चंद शब्द सुनकर पूरे परिवार की खुशियां लौट आयी हैं। अब परिवार को उनके घर आने का इंतजार है। दरअसल, इस जहाज पर यूएई, कतर और सऊदी अरब से इंडियन ऑयल के लिए लाई जा रही एलपीजी लदी थी। युद्ध जैसे हालात में इस सफर को पूरा करना किसी परीक्षा से कम नहीं था। कैप्टन सुखमीत सिंह के नेतृत्व में 27 सदस्यीय क्रू ने संयम और साहस का परिचय दिया, लेकिन जहाज के तकनीकी संचालन की पूरी जिम्मेदारी अंश के कंधों पर थी, जहां एक छोटी सी चूक भी भारी पड़ सकती थी।


वहीं, जमशेदपुर के पारडीह स्थित आशियाना वुडलैंड में अंश का परिवार पिछले एक हफ्ते से भय में जी रहा था। समुद्र के बीच अचानक परिवारवालों का अंश से संपर्क टूट गया था और घर में टीवी पर आने वाली हर खबर एक बेचैनी बन गई थी। ऐसे में यूसीआईएल से सेवानिवृत्त उप-प्रबंधक पिता मिथिलेश कुमार त्रिपाठी, मां चंदा त्रिपाठी और अंश की पत्नी चंदा मिश्रा त्रिपाठी, जो टाटा स्टील में चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, सभी हर पल अनहोनी की आशंका में थे। लेकिन, अब अंश के सुरक्षित लौटने की खबर से जैसे सभी की जिंदगी वापस लौट आई है। अब घर में राहत है, खुशी है और बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। अंश की भारत सुरक्षित वापसी पर पारडीह स्थित उनके निवास 'आशियाना वुडलैंड' में उत्सव जैसा माहौल है। पिता मिथिलेश कुमार त्रिपाठी की आंखों में चमक है। मां चंदा त्रिपाठी की बेटे की आवाज सुनकर खोई हुई सांसें वापस लौट आई है।

पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहे अंश की नींव जमशेदपुर में ही पड़ी। मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल और एईसीएस नरवा (जादूगोड़ा) से स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने 2012 में बीआईटी मेसरा से मैकेनिकल इंजीनियरिंग और 2015 में कोचीन शिपयार्ड से मरीन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। दिसंबर 2014 में शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया से जुड़ने के बाद से ही वे लगातार चुनौतीपूर्ण असाइनमेंट का हिस्सा रहे हैं। लेकिन, इस बार का मिशन अलग था। यह सिर्फ एक सफर नहीं था, बल्कि यह जिम्मेदारी, जोखिम और साहस की परीक्षा थी। समंदर की गहराइयों में, युद्ध के साये के बीच जब दुनिया डरी हुई थी, तब जमशेदपुर का यह बेटा अपने कर्तव्य पर डटा रहा और देश के लिए सुरक्षित लौटा।