द फॉलोअप रांची
झारखंड बीजेपी के इतिहास में पहली बार केंद्रीय नेतृत्व ने गजेंद्र सिंह पटेल के रूप में एक आदिवासी चेहरे (भील समाज से आने वाले) को राज्य का प्रभारी नियुक्त किया है। राज्य गठन के बाद यह पहला मौका है जब किसी एसटी नेता को यह बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को सीधे तौर पर झारखंड की 28 रिजर्व एसटी सीटों को साधने और 'सरना धर्म कोड' की मांग के बीच बीजेपी की भविष्य की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
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सरना धर्म कोड और बीजेपी की 'दुविधा'
झारखंड में लंबे समय से प्रकृति पूजक आदिवासियों के लिए अलग 'सरना धर्म कोड' लागू करने की मांग हो रही है। हेमंत सोरेन सरकार ने विधानसभा से इसका प्रस्ताव पारित कराकर केंद्र को भेजा हुआ है, जिससे यह मुद्दा पूरी तरह भावनात्मक और राजनीतिक बन चुका है। बीजेपी केंद्रीय स्तर पर अलग धार्मिक कोड देने के मूड में नहीं दिखती। आरएसएस और बीजेपी का एक बड़ा हिस्सा मानता है कि "सरना और सनातन एक हैं" और दोनों की जड़ें प्रकृति पूजा और प्राचीन परंपराओं से जुड़ी हैं।
बाबूलाल मरांडी का तर्क
झारखंड बीजेपी के कद्दावर नेता और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं कि देश में 12 करोड़ आदिवासियों की आबादी है। जब तक आधी आबादी (कम से कम 6 करोड़) एक सुर में अलग धर्म कोड की मांग नहीं करेगी, तब तक केंद्र इस पर विचार नहीं कर सकता। बीजेपी का आरोप है कि जेएमएम इस मुद्दे का इस्तेमाल केवल राजनीतिक लाभ और आदिवासियों को बांटने के लिए कर रही है।
'डी-लिस्टिंग' का मुद्दा और ध्रुवीकरण की राजनीति
सरना कोड के जवाब में बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों ने राज्य में 'डी-लिस्टिंग' के मुद्दे को हवा दी है। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि जो आदिवासी ईसाई बन चुके हैं, वे दोहरे लाभ ले रहे हैं। एक तरफ वे अल्पसंख्यक के अधिकार पा रहे हैं और दूसरी तरफ आदिवासियों के आरक्षण और हक भी मार रहे हैं। अब हर स्थानीय त्योहार और सार्वजनिक मंचों से विभिन्न आदिवासी संगठनों के जरिए यह संदेश लाउड और क्लियर दिया जा रहा है कि "सरना और क्रिश्चियन आदिवासी अलग हैं।" बीजेपी खुलकर फ्रंट पर न आकर भी इस नैरेटिव को पूरा समर्थन दे रही है ताकि गैर-ईसाई आदिवासियों को अपने पाले में लाया जा सके।

क्या भील समाज से आने वाले प्रभारी खारिज करेंगे सरना कोड?
मध्यप्रदेश-राजस्थान के भील समाज से आने वाले गजेन्द्र सिंह खुद एक ऐसे समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां आदिवासियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुद को हिंदू धर्म और उसकी संस्कृति का अभिन्न अंग मानता है। गजेन्द्र सिंह को प्रभारी बनाकर बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि देश के अन्य राज्यों (जैसे गुजरात, एमपी, छत्तीसगढ़) में आदिवासी समाज बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा है और खुद को हिंदू मुख्यधारा का हिस्सा मानता है। गजेन्द्र सिंह के आने से यह लगभग साफ माना जा रहा है कि बीजेपी 'सरना धर्म कोड' की मांग के आगे झुकने की स्थिति में नहीं है। इसके बजाय, पार्टी अब झारखंड के आदिवासियों को यह समझाने की कोशिश करेगी कि अलग कोड के चक्रव्यूह में फंसने की बजाय अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाना और धर्मांतरण के खिलाफ लड़ना उनके भविष्य के लिए ज्यादा जरूरी है। गजेन्द्र सिंह की नियुक्ति यह साफ करती है कि बीजेपी अब रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक राजनीति करेगी। वे जेएमएम के 'सरना कार्ड' का मुकाबला 'राष्ट्रवादी आदिवासी' और 'धर्मांतरण विरोधी' नैरेटिव से करने जा रही हैं। देखना दिलचस्प होगा कि भील समाज से आने वाले संगठक झारखंड के उरांव, मुंडा और संथाल आदिवासियों के बीच इस नैरेटिव को कितना स्वीकार्य बना पाते हैं।
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