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सत्ता और सचिवालय का सच : क्या दोनों कृष्ण जाएंगे...

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जीतेंद्र कुमार
कांग्रेस में घमासान मचा है, ये सबको पता है। पार्टी का बच्चा बच्चा इससे वाकिफ है। घमासान का असर अब सरकार की ओर भी मुड़ गया है। सिलेंडर से ऐसी आग लगी है कि इंडिया गठबंधन की सरकार भी झुलसने लगी है। लेकिन आग बुझानी है। कैसे बुझेगी, यह तरकीब निकालनी है। राधा बाबू शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। तिर्की जी और गुप्ता जी की कोशिशों के बाद भी वे सिलेंडर में ही विस्फोट कर बैठे हैं। इससे साफ होता जा रहा है कि वह पीछे मुड़ने की स्थिति में नहीं है। दो-दो हाथ करने को तैयार है। लेकिन राजनीति में कभी भी दो और दो चार नहीं हुआ करता। या तो वह छह हो जाता है या दो ही रह जाता है। सत्ता के गलियारे की मानें तो यहां भी दो के ही जाने के संकेत मिलने लगे हैं।


कांग्रेसियों की मानें तो मामला वैसे तो काफी उलझा हुआ है। सुलह और समाधान की तरकीब निकालना काफी मुश्किल होता जा रहा है। 18 को राजू जी आने वाले हैं। उनके आने के बाद झारखंड के बदले मौसम के मिजाज का प्रभाव राजनीतिक मौसम को भी प्रभावित कर सकता है। चर्चा है कि कोई न कोई हल इसी दरम्यान निकल सकता है। जानकार समझाते हैं। कृष्ण के उबलने से पहले पार्टी के भीतर केशव जी ही लपेटे में थे। यहां ध्यान देने की जरुरत है कि केशव ही कृष्ण और कृष्ण ही केशव हैं। इसलिए एक कृष्ण को साधने से समस्या का समाधान संभव नहीं दिखता है। इसलिए हो सकता है कि राजनीति के चौपड़ पर इस बार दो और दो, दो ही हो जाए। दोनों चले जाएं।


 

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