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हो भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर जंतर-मंतर में जनजातीय समुदाय का धरना प्रदर्शन

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द फॉलोअप डेस्क
ऑल इंडिया हो लैंग्वेज एक्शन कमेटी की ओर से शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक दिवसीय विशाल धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया गया। यह धरना जनजातीय "हो" भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग को लेकर आयोजित किया गया। देशभर से झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम के हजारों प्रतिनिधि इस आंदोलन में शामिल हुए।
जनजातीय "हो" भाषा देशभर में 50 लाख से अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। ऑल इंडिया हो लैंग्वेज एक्शन कमेटी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष सुरा बिरुली ने बताया कि पिछले तीन दशकों से "हो" भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए संघर्ष जारी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों और केंद्र सरकार से कई बार अनुरोध किया गया है। झारखंड और ओडिशा सरकार दोनों ही इस भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की अनुशंसा केंद्र को भेज चुकी हैं। इसके अलावा झारखंड में इसे द्वितीय राज्यभाषा का दर्जा भी प्राप्त है।
सुरा बिरुली ने बताया कि पिछले वर्ष केंद्रीय गृह मंत्री ने भी "हो" भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आश्वासन दिया था। झारखंड में स्नातकोत्तर स्तर पर "हो" भाषा में शिक्षा प्रारंभ हो चुकी है, वहीं ओडिशा में बहुभाषी शिक्षा (MLE) कार्यक्रम के तहत प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण शुरू किया गया है। यह शिक्षा प्री-स्कूल और आंगनवाड़ी स्तर तक विस्तारित है।
उन्होंने कहा कि प्रख्यात विद्वान सीताकांत महापात्र की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति पहले ही संविधान की आठवीं अनुसूची में "हो" भाषा को शामिल करने की सिफारिश कर चुकी है। बावजूद इसके, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी बड़ी जनजातीय आबादी अब तक अपनी मातृभाषा की संवैधानिक मान्यता से वंचित है, जबकि कई अन्य भाषाएं जिनका साहित्यिक और बोलने वाला आधार अपेक्षाकृत कम है, उन्हें पहले ही आठवीं अनुसूची में स्थान मिल चुका है। कमेटी का मानना है कि संवैधानिक मान्यता मिलने से "हो" भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन को नई ऊर्जा मिलेगी, जिससे भारत की भाषाई विविधता और जनजातीय विरासत और सशक्त होगी।
धरना प्रदर्शन में रामराय मुन्दुईया, सुरा बिरुली, सोना सुलेमान हांसदा, शान्ति सिदु, ईपिल सामड, धमोरदार जामुदा, बाजू सिरका, खिरोद हेम्ब्रोम, गोमिया ओमंग, रोशन पुरती, रवि सावियाँ, गिरीश हेम्ब्रोम और जगरनाथ केराई समेत कई जनजातीय प्रतिनिधि और भाषा कार्यकर्ता मौजूद रहे।


 

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