द फॉलोअप डेस्क
झारखंड सरकार पिछले एक दशक से झारखंड अभियंत्रण सेवा नियुक्ति नियमावली को मूर्तरूप नहीं दे पा रही है। गलत को सही ठहराने के चक्कर में पूरा मामला उलझा दिया गया है। बहुत कुछ सीधा होने के बाद, अर्थात वित्त और विधि विभाग की नियमावली के प्रस्ताव पर सहमति मिलने के बाद अब कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग तथा जेपीएससी उस संचिका पर बैठ गया है। इस पूरे उलझन की जड़ में मूल रूप से डिप्लोमा धारी अभियंताओं को प्रोन्नति में विशेष लाभ देने की बात मुख्य है। इसको लेकर कहीं तोड़-जोड़ तो कहीं नियमों की अलग अलग तरह से व्याख्या की जा रही है। जानकारी हैं कि डिप्लोमाधारी अभियंता चाहते हैं कि उन्हें मुख्य अभियंता के पद तक प्रोन्नति का लाभ दिया जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश और विभाग के पूर्व के संकल्प इसका सपोर्ट नहीं करते। हालांकि कैबिनेट द्वारा पिछले दिनों नियमावली को लौटा दिए जाने के बाद नये स्वरूप में तैयार किए गए नियमावली में डिप्लोमाधारी अभियंताओं को कार्यपालक अभियंता तक प्रोन्नति का लाभ दिए जाने की शर्त जोड़ ही दी गयी है। इसके बाद भी कार्मिक एवं जेपीएससी द्वारा नियमावली पर अपनी सहमति नहीं दी जा रही है।

नियमावली में कहां दांव, कहां पेंच
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सहायक अभियंता के पद पर दो तरह से नियुक्ति होती है। एक सीधी नियुक्ति के द्वारा। दूसरा जेई से प्रोन्नति के माध्यम से। प्रोन्नति के माध्यम से सहायक अभियंता बननेवालों में दो तरह के अभियंता होते हैं। एक डिप्लोमाधारी और दूसरा एआईएमई से अधिकृत। सीधी भर्ती से 62 फीसदी अभियंता सहायक अभियंता बनते हैं। 28 फीसदी पदों पर डिप्लोमाधारी अभियंताओं को और 10 फीसदी पदों पर एआईएमई से बने अभियंताओं को सहायक अभियंता को प्रोन्नति दी जाती है। अब विवाद की जड़ यह है कि डिप्लोमाधारी अभियंता, जो सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति पा जाते हैं, वे मुख्य अभियंता के पद तक प्रोन्नति चाहते हैं। इसके लिए नियमावली में अपने लिए प्रावधान चाहते हैं। वे चाहते हैं कि कार्यपालक अभियंता के भी 28 फीसदी पदों पर डिप्लोमाधारी को और एमआईएमई अभियंताओं को 10 फीसदी आरक्षण दिया जाए। फिर उसी अनुरूप अधीक्षण अभियंतता और मुख्य अभियंता के पदों पर भी प्रोन्नति मिले।लेकिन रोशन लाल टंडन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दे रखा है कि जब एक बार सीधी नियुक्ति और प्रोन्नति से ऊपर के पद पर समायोजित किये जा चुके अधिकारियों को फिर ऊपर के पदों पर प्रोन्नति देने में भेदभाव नहीं किया जा सकता। विधि विभाग को सहमति के लिए भेजी गयी संचिका में उप विधि परामर्शी ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का रेखांकित भी किया है। दांव-पेच का हाल यह भी है कि नियमावली को कैबिनेट के पास स्वीकृति के लिए भेजने से पहले कार्यपालिका नियमावली में इसका स्पष्ट प्रावधान किया गया है। पैतृक विभाग द्वारा नियुक्ति-प्रोन्नति नियमावली बनाने के बाद उसे कार्मिक की सहमति लेने का प्रावधान है। फिर उस पर अगर आर्थिक बोझ है तो उस पर वित्त की सहमति लेने का प्रावधान है। इसके बाद प्रस्ताव में विधि विरुद्ध प्रावधान तो नहीं है, इसके लिए विधि विभाग की भी सहमति ली जाती है। लेकिन अभियंत्रण सेवा की इस नियमावली को क्रम के विपरित कभी विधि तो कभी वित्त और कभी कार्मिक को अलग अलग भेज कर भी स्वीकृति लेने की कोशिश की गयी है।

पांच साल और आठ साल की कालावधि से भी खिलवाड़ की कोशिश
पथ निर्माण विभाग के 2009 के संकल्प के अनुसार डिप्लोमाधारी अभियंता को आठ साल में और एआईएमई कोटे के अभियंताओं को पांच साल में सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति देने का प्रावधान किया गया था। लेकिन 2014 के नये संकल्प में इसे संशोधित करते हुए दोनों कैडर के अभियंताओं के एकमुश्त आठ साल में ही सहायक अभियंता के पद प्रोन्नति देने का प्रावधान कर दिया गया। लेकिन यहां इसकी भी अनदेखी कर एआईएमई कोटे के अभियंताओं को पांच साल में ही सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति देने की असफल कोशिश की जा रही है।

नियमावली के अभाव में अभियंताओं के शीर्ष पद पर नहीं हैं नियमित अभियंता
यहां मालूम हो कि अभियंत्रण सेवा की नियुक्ति प्रोन्नति नियमावली पिछले एक दशक से सरकार के विभिन्न विभागों में फंसा है। इसको लेकर सबसे पहले 2016 में अशोक कुमार राय ने पहली बार झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उसके बाद कई अन्य अभियंताओं ने भी याचिका दायर कर रखी है। इन सभी याचिकाओं पर झारखंड हाईकोर्ट लगातार सुनवाई कर रहा है। पथ निर्माण और कार्मिक के प्रधान सचिव को लगातार फटकार लगा रहा है। सशरीर उपस्थित होने का निर्देश दे रहा है। लेकिन अभियंताओं का मामला है। ये हर तरह से सक्षम हैं, मनमाफिक नियमावली बनवाने के चक्कर में मामला उलझा रहे हैं। सरकार के शीर्ष पर बैठे अधिकारी भी उनके प्रभाव में आते जा रहे हैं।
.jpeg)