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पुरुलिया का कुड़मी महाजुटान, करने लगा झारखंड की पार्टियों और इसके नेताओं को परेशान

पुरुलिया का कुड़मी महाजुटान, करने लगा झारखंड की पार्टियों और इसके नेताओं को परेशान

 द फॉलोअप, रांची

20 सितंबर को करम पर्व के मौके पर पुरुलिया में होने वाला कुड़मी महाजुटान भले ही सांस्कृतिक आयोजन के तौर पर पेश किया जा रहा हो, लेकिन इसके राजनीतिक मायने दूर तक जाते दिख रहे हैं। आयोजन की तैयारियों और इसमें आमंत्रित नेताओं की सूची ने झारखंड से लेकर पश्चिम बंगाल और ओडिशा तक सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है। पुरुलिया क्षेत्र के कद्दावर कुड़मी नेता अजीत प्रसाद महतो की अगुवाई में होने वाले इस महाजुटान में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के अलावा असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को भी आमंत्रित किया गया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह महज एक सामाजिक-सांस्कृतिक जुटान है या इसके पीछे कुड़मी समाज को एक बड़े राजनीतिक फ्रेम में लाने की कोशिश भी है? खासकर झारखंड की राजनीति के लिहाज से यह आयोजन महत्वपूर्ण हो जाता है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों को जोड़कर देखें तो भाजपा की संभावित रणनीति के संकेत भी नजर आते हैं। आजसू की पैनी नजर है तो झामुमो चुपचाप भांप रहा है। जेएलकेएम भला आंख मूंद लेगा, यह संभव ही नहीं दिखायी दे रहा है।

जंगल महल से उठेगी कुड़मी राजनीति की नई लहर?

 पश्चिम बंगाल का जंगल महल इलाका लंबे समय से राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। पुरुलिया, झाड़ग्राम और बांकुड़ा को मिलाकर बने इस क्षेत्र में 25 विधानसभा सीटें हैं। पिछले चुनाव में भाजपा ने यहां सभी सीटों पर कब्जा जमाया था। यानी भाजपा के पास पहले से ही इस इलाके में मजबूत राजनीतिक आधार मौजूद है। कुड़मी समाज इस पूरे इलाके की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में कुड़मी समाज के एक बड़े महाजुटान के जरिए भाजपा अपने मजबूत इलाके में सामाजिक आधार को और मजबूत करने की कोशिश करे, तो इसे महज संयोग नहीं माना जा सकता। अजीत प्रसाद महतो के पुत्र विश्वजीत महतो भी इसी क्षेत्र से चुनाव जीत चुके हैं। इसलिए इस आयोजन को जंगल महल में भाजपा के सामाजिक आधार को मजबूत करने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है। इसका असर सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित रहने वाला नहीं है। जंगल महल से सटे झारखंड और ओडिशा के कुड़मी बहुल इलाकों तक इस आयोजन का संदेश पहुंचाने की कोशिश हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो आने वाले समय में इसका सीधा असर झारखंड की कुड़मी राजनीति पर पड़ सकता है।

कुड़मी समाज का वोट बैंक, लेकिन सर्वमान्य नेतृत्व का संकट

 कुड़मी समाज राजनीतिक रूप से जागरूक और संगठित समाज माना जाता है। इसके बावजूद पिछले कुछ दशकों में इस समाज को एक स्थायी और सर्वमान्य राजनीतिक नेतृत्व नहीं मिल पाया है। 1970 के दशक में विनोद बिहारी महतो कुड़मी समाज के सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित थे। 1980 के दशक में निर्मल महतो ने इस भूमिका को आगे बढ़ाया। बाद में आजसू पार्टी के जरिए सुदेश कुमार महतो ने कुड़मी समाज को अपने राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में रखने की कोशिश की। अब झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के नेता जयराम महतो इस राजनीतिक विरासत को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी राजनीतिक लोकप्रियता ने कुड़मी समाज की राजनीति को एक नया विमर्श जरूर दिया है, लेकिन अभी वह स्थिति नहीं बनी है कि जेएलकेएम अपने दम पर राज्य के राजनीतिक समीकरण को निर्णायक रूप से बदल सके। आजसू पार्टी की स्थिति भी पहले जैसी मजबूत नहीं रही है। पिछले चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि आजसू और जेएलकेएम ने कुछ सीटों पर प्रभाव जरूर डाला, लेकिन दोनों ही दल एक से अधिक सीटें जीतने में कामयाब नहीं हो सके। यही वह खाली जगह है, जिसे कोई बड़ा राजनीतिक दल भरना चाहेगा। भाजपा की नजर यहीं है।

भाजपा के लिए आजसू सबसे आसान रास्ता?

आजसू पार्टी एनडीए का हिस्सा है और झारखंड में भाजपा के साथ उसके राजनीतिक रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं। दूसरी तरफ जेएलकेएम ने अब तक खुद को किसी बड़े राजनीतिक गठबंधन से अलग रखा है। ऐसे में भाजपा के सामने एक तरफ जयराम महतो की बढ़ती राजनीतिक स्वीकार्यता की चुनौती है, तो दूसरी तरफ कुड़मी समाज के भीतर अपने प्रभाव को बनाए रखने की जरूरत। पुरुलिया का महाजुटान इस लिहाज से भाजपा के लिए एक अवसर हो सकता है। इसके जरिए वह कुड़मी समाज को यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि समाज के मुद्दे राष्ट्रीय राजनीति के एजेंडे से बाहर नहीं हैं। अगर झारखंड में इस सामाजिक गोलबंदी को आजसू के जरिए राजनीतिक समर्थन मिलता है, तो भाजपा के लिए यह समीकरण काफी उपयोगी साबित हो सकता है। खासकर उन विधानसभा सीटों पर, जहां कुड़मी मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। हालांकि, यह भी देखना होगा कि जयराम महतो इस पूरी कवायद का किस तरह जवाब देते हैं। क्योंकि कुड़मी समाज के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही प्रतिस्पर्धा आने वाले चुनावों में महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकती है।

 एसटी दर्जे की मांग फिर बनेगी बड़ा मुद्दा?

 कुड़मी समाज की दो प्रमुख मांगें लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही हैं—कुड़मी को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा और कुरमाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना। झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कुड़मी बहुल इलाकों में इन मांगों को लेकर लंबे समय से आंदोलन और राजनीतिक लामबंदी होती रही है। ऐसे में पुरुलिया का महाजुटान इन मांगों को एक बार फिर राजनीतिक मंच के केंद्र में ला सकता है। इसी संदर्भ में आजसू प्रमुख सुदेश कुमार महतो की 11 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से हुई मुलाकात भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मुलाकात के दौरान सुदेश कुमार महतो ने कुड़मी को एसटी का दर्जा देने और कुरमाली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग दोहराई है। महाजुटान से ठीक पहले हुई यह मुलाकात इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि कुड़मी समाज की मांगों और भाजपा की चुनावी रणनीति के बीच संभावित तालमेल को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं।

कुरमाली पर रास्ता आसान, एसटी दर्जे पर मुश्किल

भाजपा के लिए इन दोनों मांगों को एक साथ पूरा करना आसान नहीं है। कुरमाली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की दिशा में कदम उठाकर केंद्र सरकार कुड़मी समाज के बीच सकारात्मक राजनीतिक संदेश दे सकती है। लेकिन एसटी का दर्जा देना कहीं अधिक संवेदनशील मुद्दा है। कुड़मी को एसटी का दर्जा देने का आदिवासी समाज लंबे समय से विरोध करता रहा है। आदिवासी समुदाय को आशंका है कि कुड़मी को एसटी का दर्जा मिलने के बाद आरक्षण और सरकारी योजनाओं में उनके हिस्से पर असर पड़ेगा। उन्हें यह भी डर है कि इससे आदिवासी समाज अपने ही संवैधानिक अधिकारों में पीछे धकेला जा सकता है। इस विरोध का असर सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं रहेगा। ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी बहुल इलाकों में भी इसका राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में केंद्र सरकार के लिए एसटी दर्जे की मांग पर कोई फैसला लेना राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील होगा।

महाजुटान से निकलेगा किसका सियासी संदेश?

पुरुलिया का कुड़मी महाजुटान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक समाज का जुटान नहीं है। इसके जरिए कुड़मी समाज की सामाजिक ताकत, राजनीतिक आकांक्षा और पुराने मुद्दों को एक मंच पर लाने की कोशिश दिखाई देती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस महाजुटान के बाद कुड़मी राजनीति किस दिशा में जाती है। क्या समाज को एक बड़े राजनीतिक मंच के पीछे लामबंद करने की कोशिश होगी? क्या आजसू इसके जरिए झारखंड में अपनी जमीन मजबूत करेगी? या जयराम महतो की राजनीति के सामने कोई नया सामाजिक-राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश होगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे। लेकिन इतना साफ है कि 20 सितंबर का पुरुलिया महाजुटान सिर्फ करम पर्व का उत्सव नहीं रहने वाला। इसका राजनीतिक संदेश जंगल महल से निकलकर झारखंड तक पहुंच सकता है।

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