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अवध डेंटल कॉलेज : स्वास्थ्य विभाग ने झारखंड के 35 फीसदी छात्रों का हक मार कर दूसरे राज्यों को दे दिया

स्वास्थ्य विभाग ने झारखंड के 35 फीसदी छात्रों का हक मार कर दूसरे राज्यों को दे दिया

द फॉलोअप डेस्क, रांची
झारखंड के 35 फीसदी छात्रों का हक मार कर राज्य सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने दूसरे राज्यों को दे दिया है। नियमों को ताक पर रख कर अवध डेंटल कॉलेज जमशेदपुर को दी गयी इस छूट में बहुत बड़े खेल की बात कही जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियम के अनुसार झारखंड सहित किसी भी राज्य के डेंटल कॉलेजों में 85 फीसदी कोटा राज्य का निर्धारित है। साथ ही 15 फीसदी केंद्रीय कोटा है, जिसके विरुद्ध दूसरे राज्यों के छात्रों को नामांकन में सुविधा मिलती है। यह नियम NEET-UG द्वारा ली जाने वाली प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर BDS कोर्स के दाखिले में प्रभावी है। अर्थात बीडीएस कोर्स में होने वाले नामांकन में 85 फीसदी छात्र झारखंड के होंगे और 15 फीसदी केंद्रीय कोटे से। नामांकन का दावा करने वाले झारखंडी छात्रों के लिए शर्त भर इतनी है कि उनके पास झारखंड के स्थानीय या स्थायी निवासी होने का प्रमाण हो।


इसी नियम के तहत राज्य सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने 7 अगस्त 2026 को झारखंड संयुक्त प्रवेश प्रतियोगिता परीक्षा पर्षद के परीक्षा नियंत्रक को पत्र लिख कर केंद्र और राज्य कोटे के बारे में जानकारी भी दी। डेंटल इंस्टीट्युट रिम्स रांची और हजारीबाग कॉलेज ऑफ डेंटल साइंसेस में बीडीएस कोर्स में होने वाले नामांकन के लिए एमसीआई के गाइड लाइन का जिक्र करते हुए राज्य और केंद्रीय कोटे का स्पष्ट जिक्र किया गया। उसी तय नियम के तहत नामांकन लेने का निर्देश दिया गया। लेकिन स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सचिव दिनेश कुमार यादव द्वारा 12 अक्तूबर को अवध डेंटल कॉलेज जमशेदपुर के मामले में परीक्षा नियंत्रक को जारी पत्र ने पूरे खेल को उजागर कर दिया है। इस पत्र में स्वास्थ्य विभाग ने अवध डेंटल कॉलेज जमशेदपुर में होने वाले एडमिशन के लिए राज्य और केंद्र सरकार के कोटे को बराबर बराबर कर दिया। अब यह भेदभाव क्यों और किसको लाभ पहुंचाने के लिए किया गया, यह विभाग और इसे जुड़े जानकारों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।


 

अवध डेंटल कॉलेज को लाभ पहुंचाने में नियमों को ताक पर रख दिया गया
केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियम के अनसार MBBS, इंजीनियरिंग, BDS सहित अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में केंद्र और राज्य का कोटा क्रमश 15 फीसदी और 85 फीसदी निर्धारित है। इसका एक मात्र उद्देश्य है कि संबंधित राज्य के छात्रों को अपने गृह प्रदेश के शैक्षणिक संस्थानों में अधिक से अधिक नामांकन का मौका मिल सके। जानकारों के अनुसार कोटे से संबंधित इस केंद्रीय नियम को राज्य सरकार बदलने के लिए अधिकृत भी नहीं है। फिर भी राज्य सरकार अगर किसी तरह का बदलाव आवश्यक मानती है तो उसे नियम में बदलाव संबंधी प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री के माध्यम से कैबिनेट की स्वीकृति अपेक्षित है। लेकिन अवध डेंटल कॉलेज के मामले में न तो मुख्यमंत्री और ना ही कैबिनेट की स्वीकृति ली गयी। सिर्फ इस तर्क के आधार पर विभागीय मंत्री डॉ इरफान अंसारी ने केंद्र और राज्य कोटे में बदलाव संबंधी प्रस्ताव पर स्वीकृति प्रदान कर दी कि अवध डेंटल कॉलेज में बीडीएस के स्वीकृत सीटों के विरुद्ध अपेक्षित छात्र नामांकन नहीं ले पा रहे हैं। सीटें खाली रह जा रही हैं। हालांकि यह स्थिति राज्य के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस कोर्स में होने वाले नामांकन में भी उत्पन्न होती है। एसटी और एससी संवर्ग के छात्र तय मानदंड पूरा नहीं कर पाने की वजह से नामांकन नहीं ले पाते और सीटें खाली रह जाती है। फिर उस समय स्वास्थ्य विभाग राज्य कोटे की सीटों को क्यों नहीं केंद्रीय कोटे में ट्रांसफर कर देती है। लेकिन अवध मेडिकल कॉलेज पर स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गयी विशेष कृपा के पीछे बड़े खेल की चर्चा है।

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