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गुमला में खस्ताहाल 108 एंबुलेंस सेवा, मरीजों की जान सुरक्षित नहीं; सिविल सर्जन ने भी मानी खामियां

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सुशील कुमार सिंह/गुमला: 

गुमला में 108 एंबुलेस सेवा हाथी का सफेद दांत साबित हो रही है। गुमला में सम्मान एजेंसी के माध्यम से 17 एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई है, लेकिन इनमें से अधिकांश बेकार पड़ी है। बीते दिनों गुमला में 12 साल की शिवानी लोहरा की मौत हो गई थी, क्योंकि कई बार धक्का लगाने के बाद भी एंबुलेंस स्टार्ट नहीं हुआ। द फॉलोअप संवाददाता सुशील कुमार सिंह ने जिले में एंबुलेंस सेवा की पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आये। गुमला के सिविल सर्जन शंभूनाथ चौधरी ने जानकारी दी है कि जिले में कुल 17 एंबुलेंस 108 सेवा के तहत मुहैया कराया गया है, लेकिन इनमें केवल 4 ही एंबुलेंस इस स्थिति में हैं कि मरीज को रांची तक पहुंचाया जा सके। 

सिविल सर्जन ने 108 एंबुलेंस सेवा पर क्या कहा!
गुमला के सिविल सर्जन ने माना कि जिले में 108 एंबुलेंस सेवा के संचालन में कई खामियां हैं। उन्होंने खुलासा किया कि कई बार उनके फोन करने पर भी एंबुलेंस चालक रिस्पॉंस नहीं करते। उन्होंने बताया कि विभाग के साथ एमओयू के आधार पर सम्मान फाउंडेशन को जिले में एंबुलेंस के संचालन का जिम्मा सौंपा गया है। फाउंडेशन को न केवल एंबुलेंस का सुचारु रूप से संचालन करना है, बल्कि एंबुलेंस की रिपेयरिंग और उसमें दवाइयों समेत उपकरणों की आपूर्ति  का काम भी करना है। सिविल सर्जन का आरोप है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद सम्मान फाउंडेशन द्वारा न तो एंबुलेंस की रिपेयरिंग की जाती है और ना ही अन्य व्यवस्था में सुधार किया जाता है। उन्होंने बताया कि उन्होंने मरीजों की शिकायत पर कई बार प्रैंक कॉल के जरिए क्रॉस चेक किया है, लेकिन अधिकांश समय में रिस्पॉंस नहीं मिला।

 

बुजुर्ग मरीज को भटकने के लिए छोड़ दिया गया!
गुमला में मरीजों और उनके तीमारदारों की यह भी शिकायत है कि आपात स्थिति में भी 108 एंबुलेंस सेवा से संपर्क करने पर सकारात्मक रिस्पॉंस नहीं मिलता। पड़ताल के दौरान एक बुजुर्ग मरीज मिले, जिनको डॉक्टर ने बेहतर इलाज के लिए रांची रेफर किया, लेकिन उन्हें न तो एंबुलेंस उपलब्ध कराया गया और ना ही कोई अटेंडेंट था। उनकी शिकायत थी कि अटेंडेंट के बाबत पूछने पर उन्हें बस में जाने की सलाह दी गई। 

एंबुलेंस में ऑक्सीजन समेत जरूरी उपकरण नहीं!
सिविल सर्जन डॉ. शंभूनाथ चौधरी ने बताया कि एंबुलेंस में ऑक्सीजन का भी अभाव है। संचालकों से सवाल करने पर जवाब मिला कि रांची से ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं की जा रही है। उन्होंने कहा कि दूरदराज के गरीब मरीजों को तो पता भी नहीं होता है कि एंबुलेंस में ऑक्सीजन का होना अनिवार्य है, लेकिन जो लोग मिडिल क्लास से हैं और जागरूक हैं, वे आकर सवाल करते हैं। सिविल सर्जन ने माना कि फाउंडेशन की गलतियों का खामियाजा अस्पताल प्रबंधन और उनको भुगतना पड़ता है। 

एंबुलेंस का खराब संचालन जानलेवा हो सकता है!
सामाजिक कार्यकर्ता मुख्तार आलम ने कहा कि गुमला में एंबुलेंस सेवा खस्ताहाल है। एंबुलेंस का अभाव मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। मुख्तार आलम ने आरोप लगाया कि जिले में पहले तो एंबुलेंस सही समय पर नहीं मिलता, और यदि मिला भी तो उसमें जरूरी उपकरण नहीं होते। उन्होंने कहा कि विभाग दावा तो करता है, लेकिन जमीनी हकीकत दावों के ठीक उलट है। 

झारखंड के अधिकांश जिले में एंबुलेंस का बुरा हाल
ये कहानी केवल गुमला की नहीं है। प्रदेश के अधिकांश जिलों में 108 एंबुलेंस सेवा खस्ताहाल है। कहीं धक्का लगाने के बावजूद एंबुलेंस स्टार्ट नहीं होता तो कहीं बीच रास्ते में इसका टायर फट जाता है। कहीं एंबुलेंस में ऑक्सीजन नहीं होता तो कहीं कई बार संपर्क किए जाने के बाद भी सही वक्त पर एंबुलेंस नहीं मिलता। हाल ही में जामताड़ा में सही समय पर एंबुलेंस नहीं मिलने की वजह से गर्भवती महिला और उसके नवजात शिशु की मौत हो गई थी। इस घटना को लेकर जामताड़ा सदर अस्पताल में भारी बवाल हुआ था। 


 

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