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मुख्य सचिव ने दिया स्वास्थ्य विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के जांच का आदेश

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द फॉलोअप, रांची
झारखंड के स्वास्थ्य परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग से जुड़े चिकित्सा महाविद्यालयों, अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में भेदभावपूर्ण तरीके से छह कंपनियों को ही अधिकतर टेंडर-ठेका देने का मामला प्रकाश में आया है। आरोप है कि विभागीय मंत्री इरफान अंसारी के संरक्षण में मुख्य रूप से छह कंपनियां दबाव बना कर स्वास्थ्य विभाग के पूरे सिस्टम को हाईजैक कर लिया है। आउट सोर्स, मैन पावर, दवा सप्लाई जैसे अधिकतर टेंडर इन्हीं छह कंपनियों को दिए जा रहे हैं। इसके लिए हर स्तर पर नियमों और शर्तों को मनमाफिक तरीके से समय और परिस्थिति के अनुरूप बदल दिया जाता है। स्वास्थ्य विभाग के इस भ्रष्टाचार की लिखित शिकायत मिलने के बाद मुख्य सचिव अविनाश कुमार ने विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह को जांच का आदेश दिया है। हालांकि विभाग में जारी भेदभाव और भ्रष्टाचार का स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के माध्यम से जांच पर सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं। इसके लिए किसी निष्पक्ष एजेंसी या किसी दूसरे विभाग के वरीय आईएएस अधिकारी से जांच कराने पर ही दूध का दूध और पानी का पानी होने की उम्मीद की जा रही है।


7 अप्रैल 2026 को मुख्य सचिव को सौंपे गए पत्र में कहा गया है कि स्वास्थ्य विभाग के टेंडरों में तीन भाइयों की अहम भूमिका है। इन्हें मंत्री इरफान अंसारी का पूरा संरक्षण प्राप्त है। तीनों भाइयों के नाम क्रमशः ख्वाजा अब्दुल ओएदीर अहमद भट, ख्वाजा नसीम उदीन और ख्वाजा फरहान अहमद है। इनके पिता का नाम ख्वाजा नसीम उदीन है। तीनों भाइयों ने अलग अलग छह फर्म खोल रखे हैं। उसके नाम हैं- HIND INFRA PROJECT PVT LTD, GST- 20AADCH8192C1ZX, CURING PHARMACEUTICALE, GST-20AJFPB9468H1ZC, BHARAT ARTS & SUPPLIERS, ALL TIME MEDICINE GST-20BEYPK1000D2ZS,HRUDAYALAYA GST-20BSXPB3479E2ZP,MAYURI SOLUTION GST-20AFSPA3696P2ZX. आरोप है कि ये सभी फर्म मंत्री के आवास से संचालित होते हैं। जेम पोर्टल के ई-टेंडर द्वारा स्वास्थ्य मंत्री के नाम पर जिलों में दबाव बनाया जाता है। फिर ऊंचे दरों पर स्वास्थ्य विभाग के काम आपस में बांट लिए जाते हैं। इसके लिए समय समय पर टेंडर की शर्तों और आहर्ताओं में बदलाव किया और कराया जाता है।

उदाहरण के रूप में हाल में कोडरमा के सिविल सर्जन द्वारा ई-निविदा (05/26) प्रकाशित की गयी है। दवा और विभिन्न सामग्रियों की खरीद के लिए निकाले गए इस टेंडर में निविदा जमा करने की अंतिम तिथि 14 अप्रैल 2026 थी। इस निविदा में यह शर्त रखी गयी है कि संवेदक के पास पूर्व का एक सिंगल ऑर्डर एक करोड़ से कम का नहीं होना चाहिए। साथ ही उसे पूर्व में दो करोड़ का ऑर्डर प्राप्त करने का अनुभव भी होना चाहिए। जबकि राज्य के अन्य अस्पतालों की निविदा में एक करोड़ से कम का सिंगल ऑर्डर की शर्त नहीं रहा है। आरोप है कि इस तरह की शर्तों को जोड़ कर अन्य फर्मों और संवेदकों को स्वास्थ्य विभाग के टेंडरों से बाहर किया जा रहा है। इस तरह के भेदभावपूर्ण शर्तें सामग्री खरीद,दवा खरीद में रखी जा रही है।


आरोप है कि दबाव और भेदभावपूर्ण तरीके से टेंडर देने और लेने का यह खेल रिम्स के अलावा अन्य सरकारी अस्पतालों में जारी है। रिम्स में शोएब नामक व्यक्ति को दिए गए आउट सोर्स का काम अन्य अस्पतालों की दर से कहीं अधिक है। जिन जिलों के आउट सोर्स, सामग्री और दवा खरीद में भेदभाव और असामान्य नियमों का पालन किया जा रहा है, उनमें कोडरमा, दुमका, जामताड़ा, देवघर, साहेबगंज, गोड्डा, पाकुड़ और रांची प्रमुख है। 


जांच में इन सवालों का जबाव अपेक्षित है
स्वास्थ्य विभाग के जानकारों का मानना है कि कुछ यक्ष सवालों का जवाब आए बगैर आरोपों की जांच निर्रथक है। राज्य के विभिन्न सरकारी मेडिकल कॉलेजों, सदर अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों में दवा, विभिन्न सामग्री और उपकरणों की खरीद के लिए एक समान नियम ( स्टैंडर्ड बिडिंग डोक्युमेंट) है? आउट सोर्स पर लिए जानेवाले मानव संसाधनों के लिए भी कोई एक नियम या शर्त है? अगर नहीं है तो भिन्न भिन्न अस्पतालों में सामान और उपकरणों की खरीद का दर अलग-अलग क्यों हैं? साथ ही अगर स्वास्थ्य विभाग के ही अधिकारी इतने बड़े पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार और भेदभाव की जांच करते हैं तो क्या वह निष्पक्ष हो पाएगा, जिनके संरक्षण में ये जारी है।


 

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