द फॉलोअप डेस्कः
सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के लाभ को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को हिंदू धर्म में अनुसूचित जाति (SC) या पिछड़े वर्ग से जुड़े होने के आधार पर मिलने वाला आरक्षण दूसरे धर्म को अपनाने के बाद स्वतः जारी नहीं रह सकता। सामाजिक पिछड़ेपन से जुड़ी स्थिति एक धर्म से दूसरे धर्म में जाने पर अपने आप लागू नहीं होती। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसके तहत धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने वाले लोगों को पिछड़े मुस्लिम वर्ग के अंतर्गत आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था की गई थी।

इस्लाम अपनाने से पिछड़े मुस्लिम वर्ग में स्वतः शामिल नहीं होंगे लोग
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि केवल इस्लाम अपनाने से कोई व्यक्ति राज्य की अधिसूचित पिछड़े मुस्लिम समुदायों में स्वतः शामिल नहीं हो जाता। पुराने जाति या समुदाय की पहचान के आधार पर नए धर्म में आरक्षण का लाभ अपने आप नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने अनुसूचित जाति के दर्जे को लेकर भी स्पष्ट किया कि यह संविधान में निर्धारित धर्म संबंधी प्रावधानों के अनुरूप ही तय होगा। ऐसे में आरक्षण का दावा करने के लिए संबंधित समुदाय की निर्धारित पात्रता और लागू संवैधानिक नियमों का पालन आवश्यक है।

मार्च 2024 के सरकारी आदेश को हाईकोर्ट ने किया था रद्द
दरअसल, तमिलनाडु सरकार ने मार्च 2024 में एक आदेश जारी किया था। इसके तहत पिछड़े वर्ग, अति पिछड़े वर्ग, कुछ अधिसूचित समुदायों और अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को पिछड़े मुस्लिम वर्ग के तहत प्रमाणपत्र जारी कर आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था की गई थी। इस आदेश को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था, जिसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी है। इस फैसले से धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण की पात्रता को लेकर संवैधानिक प्रावधानों और निर्धारित समुदायों की शर्तों का महत्व फिर स्पष्ट हुआ है।