द फॉलोअप डेस्क
रांची प्रेस क्लब में धर्मेश उरांव मेमोरियल फाउंडेशन के बैनर तले छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) 1908 पर विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, आदिवासी मामलों के जानकार, पूर्व पुलिस अधिकारी, हाईकोर्ट के अधिवक्ता तथा विभिन्न क्षेत्रों के बुद्धिजीवी शामिल हुए। वक्ताओं ने सीएनटी एक्ट के क्रियान्वयन में आ रही व्यावहारिक कठिनाइयों, भूमि हस्तांतरण, ऋण सुविधा और विकास संबंधी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।
परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि सीएनटी एक्ट के तहत अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए भूमि खरीद-बिक्री को लेकर थाना क्षेत्र आधारित व्यवस्था आज के समय में कई तरह की जटिलताएं पैदा कर रही है। झारखंड राज्य गठन के बाद बड़ी संख्या में लोग रोजगार और शिक्षा के लिए गांवों से शहरों की ओर आए हैं, लेकिन पुराने राजस्व थाना क्षेत्र और वर्तमान प्रशासनिक थाना क्षेत्रों के बीच अंतर के कारण भूमि क्रय-विक्रय की प्रक्रिया में भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
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सीएनटी-एसपीटी एक्ट की समीक्षा जरूरी
वक्ताओं ने कहा कि इस व्यवस्था के कारण आदिवासी परिवारों को अपनी जमीन के बदले ऋण लेने, बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने तथा अन्य विकासात्मक जरूरतों को पूरा करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में इस विषय पर एक समिति का गठन किया गया था तथा तत्कालीन मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा की अध्यक्षता में उपसमिति ने कुछ सुझाव भी दिए थे, लेकिन सरकार बदलने के बाद मामला आगे नहीं बढ़ सका।
चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि सीएनटी एक्ट और एसपीटी एक्ट जैसे कड़े कानून होने के बावजूद भूमि हस्तांतरण के मामलों में कई स्तरों पर खामियां बनी हुई हैं। वक्ताओं ने सरकार से पुरानी समिति की अनुशंसाओं को पुनर्जीवित कर आवश्यक संशोधन एवं स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की।

आदिवासी भूमि कानूनों की समीक्षा और विवाद समाधान के लिए स्वतंत्र आयोग बनाने की मांग
पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि केवल चर्चा से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि ठोस दस्तावेज और सुझाव तैयार कर सरकार को सौंपने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आदिवासी हितों की रक्षा के लिए बने कानूनों के कारण जहां एक ओर भूमि संरक्षण हुआ है, वहीं दूसरी ओर ऋण, मॉर्गेज और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी कई व्यावहारिक समस्याएं भी सामने आई हैं। इन विषयों का गंभीर अध्ययन कर राज्य सरकार को सुझाव दिया जाएगा।
बंधु तिर्की ने कहा कि धर्मेश उरांव मेमोरियल फाउंडेशन समय-समय पर आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों पर विमर्श करता रहा है और आगे भी सरकार तक समुदाय की समस्याओं को पहुंचाने का काम करेगा। उन्होंने कहा कि भूमि विवाद और थाना आधारित अनुमतियों से जुड़े मामलों के समाधान के लिए एक स्वतंत्र आयोग के गठन पर भी विचार किया जाना चाहिए, जिससे छोटे-छोटे मामलों का त्वरित निपटारा हो सके। परिचर्चा में शामिल वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि भूमि और आदिवासी अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर समय रहते गंभीर पहल नहीं की गई तो भविष्य में इसके व्यापक सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं।
