हजारीबाग
भीषण गर्मी, अंधेरा और एक्स-रे मशीन के नीचे लेटी एक मासूम बच्ची. उसका बेबस पिता हाथ से कागज़ हिलाकर उसे हवा देने की कोशिश कर रहा है. बच्ची की मां माथा पकड़कर बैठी बिजली आने का इंतज़ार कर रही है. यह तस्वीर झारखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्र की नहीं है, बल्कि हज़ारीबाग के शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल की है.
अस्पताल में 3 जनरेटर है मौजूद
जहां हर साल करोड़ों रुपये का बजट आता है, जहाँ 263 KVA, 163 KVA और 63 KVA (किलोवोल्ट-एम्पीयर) के तीन-तीन जनरेटर मौजूद हैं, जहां सोलर सिस्टम के बड़े-बड़े सेटअप लगे हैं, फिर भी बिजली कटते ही पूरा अस्पताल अंधेरे और गर्मी के हवाले हो जाता है. सवाल यह है कि आखिर करोड़ों रुपये जाते कहां हैं? अगर अस्पताल में भर्ती मरीजों को इस तपती गर्मी में हाथ पंखे का सहारा लेना पड़ रहा है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? जिम्मेदार लोग शायद सिर्फ फाइलों में व्यवस्था दुरुस्त दिखाने में व्यस्त हैं. क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही सिस्टम की नींद खुलेगी? या फिर अस्पतालों में इंसान नहीं, सिर्फ आंकड़े बचेंगे?
