रांची
NTPC ने बड़कागांव में पूर्व मंत्री योगेंद्र साव की संपत्ति हटाने के मामले में विस्तृत सफाई दी है। कंपनी के अनुसार, तीन बार नोटिस देने के बावजूद उन्होंने मुआवजे की राशि नहीं ली, जिसके बाद नियम के तहत यह राशि सक्षम ट्रिब्यूनल में जमा करा दी गई।
कंपनी का कहना है कि जिस जमीन पर यह निर्माण हुआ था, वह पहले से अधिग्रहित भूमि थी। ग्राम जोरदाग, प्लॉट संख्या-13 को कोल बेयरिंग एरियाज (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम, 1957 के तहत वर्ष 2008 में ही अधिग्रहित कर लिया गया था और इसकी राशि पहले ही सरकारी कोष में जमा की जा चुकी थी।
.jpg)
नोटिस के बाद भी नहीं उठाया कदम
एनटीपीसी के मुताबिक, भवन निर्माण विभाग, हजारीबाग से संपत्ति का मूल्यांकन कराने के बाद योगेंद्र साव को तीन बार डाक के माध्यम से नोटिस भेजा गया था। उनसे जरूरी दस्तावेज जमा कर मुआवजा लेने को कहा गया, लेकिन उनकी ओर से कोई पहल नहीं हुई। इसके बाद 15 जुलाई 2025 को कानून के प्रावधानों के तहत मुआवजा राशि ट्रिब्यूनल में जमा कर दी गई।
परियोजना विस्तार के लिए पहले 1 अगस्त 2025 को ईंट भट्ठे की चिमनी हटाई गई थी। इसके बाद 19 मार्च 2026 को जिला प्रशासन की मौजूदगी में अधिग्रहित जमीन का कब्जा लेकर बाकी संरचनाओं को भी हटा दिया गया। कंपनी ने कहा है कि यह पूरी कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई।
.jpg)
अब सियासत भी गरम
इस मामले के सामने आने के साथ ही झारखंड की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। हाल ही में कांग्रेस ने योगेंद्र साव को अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से तीन साल के लिए निष्कासित कर दिया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने पार्टी लाइन से हटकर बयान दिए थे, खासकर मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के खिलाफ टिप्पणी के बाद पार्टी ने सख्त रुख अपनाया।
कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि संगठन में अनुशासन बनाए रखना जरूरी है और इसी वजह से यह कार्रवाई की गई। राजनीतिक जानकार इसे एक बड़े संदेश के तौर पर देख रहे हैं, जिसमें पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि सार्वजनिक असहमति को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
.jpeg)
विकास बनाम विवाद
एनटीपीसी का कहना है कि परियोजना क्षेत्र में सभी काम कानून के अनुसार और प्रशासन के सहयोग से किए जा रहे हैं, ताकि खनन परियोजना आगे बढ़ सके और क्षेत्र का विकास हो। वहीं दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम ने विकास और विवाद के बीच नई बहस को जन्म दे दिया है।
