पाकुड़
पाकुड़-राजग्राम मालपहाड़ी सड़क की नारकीय स्थिति और जलमग्न गड्डों की खबर चलने के बाद भी जिला प्रशासन और पथ निर्माण विभाग की नींद नहीं टूटी। अधिकारियों के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। जब जिम्मेदार अफसरों ने आंखें मूंद लीं, तो प्रशासनिक नाकामी से आजिज आकर ग्रामीणों ने खुद ही कमान संभाल ली। गुरुवार को नबीनगर गांव के समीप स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा और संयम जवाब दे गया। इसके बाद दर्जनों ग्रामीणों ने एकजुट होकर नबीनगर के पास श्रमदान कर सड़क की स्थिति सुधारने का काम शुरू कर दिया। स्थानीय ग्रामीणों, युवाओं और बुजुर्गों ने खुद ही डस्ट, मलबे और धुला का इंतजाम किया और सड़क पर बने जानलेवा तालाबों व गड्ढों में तब्दील हुई सड़क को भरना शुरू कर दिया।

पथ निर्माण विभाग के साहबों को कोई फर्क नहीं
नबीनगर गांव के पास जहां पानी भरा हुआ था, वहां ग्रामीणों ने घंटों पसीना बहाकर गड्ढों को समतल किया, ताकि स्कूली बच्चों, मरीजों और आम राहगीरों को हादसों से बचाया जा सके। इस दौरान श्रमदान कर रहे ग्रामीणों का गुस्सा साफ झलक रहा था। स्थानीय लोगों ने कहा इस सड़क की भयंकर दुर्दशा के बाद भी जब जिला प्रशासन और पथ निर्माण विभाग के साहबों को कोई फर्क नहीं पड़ा, तो हमें समझ आ गया कि इनके भरोसे रहे तो आए दिन कोई न कोई हादसे का शिकार होता रहेगा। हमारे बच्चे इसी रास्ते से स्कूल जाते हैं, एंबुलेंस फंसती हैं। लाचारी में हमें खुद फावड़ा उठाना पड़ा। लाखों-करोड़ों रुपये का राजस्व देने वाले इस इलाके में आम जनता को गड्ढे भरने के लिए खुद श्रमदान करना पड़े, यह जिला प्रशासन और पथ निर्माण विभाग के मुंह पर जोरदार तमाचा है।

ग्रामीणों ने श्रमदान कर मिसाल पेश की
सवाल यह उठता है कि जिस काम को करने के लिए विभाग के पास बकायदा बजट और अमला मौजूद है, उस काम को गांव के आम लोग अपने संसाधनों से करने पर क्यों मजबूर हैं। नबीनगर के ग्रामीणों ने श्रमदान करके नागरिक कर्तव्य और एकजुटता की जो मिसाल पेश की है, वह काबिले तारीफ है। लेकिन यह स्थिति जिला प्रशासन की अकर्मण्यता को उजागर करती है। क्या प्रशासन को केवल राजस्व वसूलने से मतलब है। अगर ग्रामीण खुद ही सड़क की मरम्मत करेंगे, तो पथ निर्माण विभाग के अधिकारियों की क्या जवाबदेही है। प्रशासन को अब कम से कम शर्म महसूस करते हुए इस अंतरराज्यीय मार्ग के पक्के और स्थायी सुदृढ़ीकरण की दिशा में तुरंत ठोस कदम उठाना चाहिए।