जमशेदपुर
जिले में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में सरयू राय ने मौजूदा विकास मॉडल पर सवाल उठाते हुए ‘सनातन विकास’ की अवधारणा को आगे बढ़ाने की बात कही। उन्होंने कहा कि आज जिस तरह का विकास हो रहा है, वह प्रकृति और पर्यावरण के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है। पहले पहाड़ नदी और जंगलों को बचाने की जरूरत है, उसके बाद विकास की दिशा तय होनी चाहिए।
मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए सरयू राय ने कहा कि विकास ऐसा होना चाहिए जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रख सके। उन्होंने कहा कि 'चरैवेति-चरैवेति' के सिद्धांत पर आधारित विकास ही सही मायने में सनातन विकास है। यह ऐसा मॉडल है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे और प्रकृति का संतुलन बनाए रखे।

पर्यावरण कानूनों के पालन पर उठाए सवाल
सारी राय कि आज दुनिया में सस्टेनेबल डेवलपमेंट की चर्चा हो रही है और भारत सरकार ने भी 2030 तक इसके लक्ष्य तय किए हैं लेकिन जमीन पर इसका असर दिखाई नहीं देता। ऐसे में भारत की पारंपरिक सोच और प्रकृति आधारित विकास मॉडल को अपनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सनातन विकास का अर्थ है “नित्य नूतन, चिर पुरातन”, यानी पुरानी परंपराओं और मूल्यों को आधुनिक जरूरतों के साथ आगे बढ़ाना।
सरयू राय ने पर्यावरण कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि देश में पहले से कई कानून मौजूद हैं लेकिन उनका सही तरीके से पालन नहीं हो रहा। कई बार कानूनों को उनकी मूल भावना के विपरीत लागू किया जाता है। उन्होंने कहा कि नया कानून बनने से कम से कम जनता के हाथ में एक और संवैधानिक हथियार आएगा जिससे वे न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकेंगे।