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पहचान ही अस्तित्व है: कुड़मी समाज ने जनगणना में सही पहचान दर्जीकरण को लेकर भरी हुंकार

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सरायकेला खरसावां

सरायकेला खरसावां जिला के ईचागढ़ प्रखंड अंतर्गत सोड़ो पंचायत के आदरडीह गांव स्थित सामुदायिक भवन में आदिवासी कुड़मी समाज का एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि सम्मेलन आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम ग्राम प्रधान शिवराम महतो की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2026-27 की जनगणना में कुड़मी समाज की सही जातीय एवं भाषाई पहचान को सुनिश्चित कराने पर रहा। इस दौरान सैकड़ों की संख्या में विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया और समाज को एकजुट होकर अपनी पहचान, भाषा और अधिकार के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया। वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि अब समय आ गया है कि कुड़मी समाज संगठित होकर अपने अस्तित्व और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए आगे आए। उन्होंने कहा कि यदि समाज अपनी पहचान को मजबूत नहीं करेगा तो आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

पहचान ही अस्तित्व है और अस्तित्व ही अधिकार

सम्मेलन में समाज के संयोजक और मूलमानता अजीत प्रसाद महतो ने भावनात्मक लेकिन सख्त संदेश देते हुए कहा कि “पहचान ही अस्तित्व है और अस्तित्व ही अधिकार की पहली शर्त है। यदि हम अपनी जाति और भाषा को सही रूप में दर्ज नहीं कराएंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।” उन्होंने समाज से अपील की कि आगामी जनगणना में अपनी जाति “कुड़मी” और भाषा “कुड़माली” को स्पष्ट रूप से दर्ज कराएं। उन्होंने कहा कि यही समाज की असली ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान है, जिसे वर्षों से गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया और सरकारी अभिलेखों में भ्रम की स्थिति बनाई गई। अजीत प्रसाद महतो ने आरोप लगाया कि कुड़मी पहचान को कमजोर करने की कोशिशें लंबे समय से होती रही हैं, जो केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि ऐतिहासिक पहचान को प्रभावित करने की एक गंभीर प्रक्रिया रही है।

एक आवाज- जाति कुड़मी, भाषा कुड़माली

उन्होंने कहा कि अब समाज को भावनात्मक नहीं बल्कि दस्तावेजी और कानूनी स्तर पर अपनी लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने आगे कहा कि जनगणना ही वह सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक माध्यम है, जिसके जरिए कोई भी समाज अपनी वास्तविक जनसंख्या, भाषा और अस्तित्व को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर सकता है। सम्मेलन में यह भी चर्चा हुई कि पूर्व में केंद्रीय नेतृत्व द्वारा कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आश्वासन दिया गया था। समाज ने इस पर विश्वास जताकर समर्थन भी दिया था, ऐसे में अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने वादे को पूरा करे। अन्यथा समाज को आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा। अंत में सम्मेलन से पूरे कुड़मी समाज के नाम एक संयुक्त संदेश जारी किया गया। “एक समाज, एक पहचान, एक आवाज- जाति कुड़मी, भाषा कुड़माली। जनगणना में सही पहचान दर्ज कराएं, अपना इतिहास और अधिकार बचाएं।”

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