द फॉलोअप डेस्क, रांची:
झारखंड की गिरिडीह विधानसभा सीट पर उपचुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है। मंत्री सुदिव्य सोनू के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर अब नए राजनीतिक समीकरण बनने की संभावना है। उपचुनाव की तारीखों का ऐलान भले ही नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। इसी बीच चर्चा है कि जयराम महतो की पार्टी JLKM गिरिडीह उपचुनाव में अपना उम्मीदवार उतार सकती है। अगर ऐसा होता है, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है और झामुमो और भाजपा, दोनों की चुनावी रणनीतियों पर असर पड़ सकता है।
JLKM की एंट्री से बढ़ेगी JMM-BJP की टेंशन
मंत्री सुदिव्य सोनू के निधन के बाद गिरिडीह सीट पर JMM के सामने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की चुनौती होगी। वहीं BJP के लिए यह सीट पर अपनी पुरानी पकड़ मजबूत करने का अवसर बन सकती है। ऐसे में JLKM की संभावित एंट्री मुकाबले को और दिलचस्प बना सकती है।
जयराम महतो की पार्टी अगर अपने उम्मीदवार के साथ मैदान में उतरती है, तो वह यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि उसकी राजनीति स्वतंत्र है और वह किसी बड़े दल के सहारे अपनी पहचान बनाने के बजाय अपने दम पर चुनाव लड़ना चाहती है। हालांकि, JLKM की ओर से उम्मीदवार उतारने को लेकर आधिकारिक घोषणा होने तक इसे संभावित चुनावी रणनीति के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। हालांकि, JLKM की ओर से आधिकारिक रूप से चुनाव लड़ने की घोषणा नहीं की गई है।
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2024 के चुनाव में किसे मिले कितने वोट?
पिछले चुनावी नतीजों पर अगर नजर डाले तो गिरिडीह विधानसभा सीट पर 2024 में JMM की टिकट पर सुदिव्य सोनू ने दूसरी बार जीत दर्ज की थी। उन्हें 94 हजार 42 वोट मिले थे, जबकि BJP के निर्भय शाहाबादी को 90 हजार 204 वोट मिले थे। दोनों के बीच जीत का अंतर केवल 3 हजार 838 वोटों का था। वहीं JLKM के उम्मीदवार नवीन आनंद ने 10 हजार 787 वोट हासिल किए थे। यानी JLKM को मिले वोटों को नजरअंदाज करना JMM और भाजपा, दोनों के लिए आसान नहीं होगा।
हालांकि, यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि JLKM के सभी वोट किसी एक पार्टी के वोट बैंक से आए थे या भविष्य में उसी अनुपात में वोटों का स्थानांतरण होगा। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि JLKM को पिछले चुनाव में मिले वोटों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि JLKM के सभी वोट किसी एक पार्टी के मतदाताओं से आए थे या उपचुनाव में भी वही मतदाता उसी पार्टी को वोट देंगे।

उम्मीदवार का चेहरा तय करेगा मुकाबले की दिशा
गिरिडीह उपचुनाव में JLKM के लिए केवल उम्मीदवार उतारना ही पर्याप्त नहीं होगा। पार्टी को ऐसा चेहरा तलाशना होगा, जिसकी स्थानीय स्तर पर अच्छी पकड़ हो और जो क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों को समझता हो। इसके साथ ही गांव-गांव जनसंपर्क, युवाओं को जोड़ना, स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाना और संगठन को सक्रिय रखना भी महत्वपूर्ण होगा। अगर JLKM मजबूत उम्मीदवार उतारने और अपने समर्थकों को मतदान केंद्रों तक पहुंचाने में सफल होती है, तो वह चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है। दूसरी ओर, संगठनात्मक कमजोरी या कमजोर उम्मीदवार उसकी संभावनाओं को सीमित कर सकता है।

2029 के विधानसभा चुनाव से पहले JLKM के लिए बड़ा मौका
गिरिडीह उपचुनाव JLKM के लिए केवल एक विधानसभा सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक ताकत परखने का अवसर भी बन सकता है। अगर पार्टी अपने पिछले प्रदर्शन में सुधार करती है और वोट प्रतिशत बढ़ाने में सफल होती है, तो 2029 के विधानसभा चुनाव से पहले उसकी दावेदारी मजबूत हो सकती है। वहीं, किसी बड़े राजनीतिक गठबंधन के साथ जाने या स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का फैसला भी उसकी राजनीतिक पहचान को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में गिरिडीह उपचुनाव JLKM के लिए अपनी संगठनात्मक क्षमता और स्वतंत्र राजनीतिक आधार साबित करने का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।
अब सबकी नजर जयराम महतो के अगले कदम पर
फिलहाल गिरिडीह उपचुनाव को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जयराम महतो की पार्टी JLKM अपना उम्मीदवार उतारेगी? अगर पार्टी चुनाव लड़ने का फैसला करती है, तो क्या वह JMM और भाजपा, दोनों के लिए नई चुनौती खड़ी कर पाएगी? इसका जवाब उम्मीदवार की घोषणा, चुनावी रणनीति और जनता के रुझान से ही सामने आएगा। लेकिन इतना तय है कि JLKM का फैसला गिरिडीह सीट के चुनावी समीकरणों को चर्चा के केंद्र में ला सकता है।