द फॉलोअप डेस्क
झारखंड पुलिस सिपाही भर्ती-2015 में चयन प्रक्रिया के सभी चरण पूरे करने के बावजूद नियुक्ति से वंचित रह गए अभ्यर्थियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शुक्रवार, 21 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने राज्य सरकार को पात्र अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन पूरा कर चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने और नियुक्ति-पत्र जारी करने का निर्देश दिया है। अभ्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम और AOR वात्सल्य विज्ञा एवं अन्य ने पक्ष रखा।
छह याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई
नियुक्ति से वंचित अभ्यर्थियों ने झारखंड सरकार के खिलाफ 6 अलग-अलग SLP दायर की थीं, जिन पर एक साथ सुनवाई हुई:
1. जितेंद्र कुमार शर्मा व अन्य - SLP (C) No. 1359/2023
2. महताब खान व अन्य - SLP (C) No. 3950/2023
3. विष्णु कांत पांडेय व अन्य - SLP (C) No. 3964/2023
4. प्रकाश कुमार पांडेय व अन्य - SLP (C) No. 16380/2023
5. मिथिलेश कुमार महतो व अन्य - SLP (C) No. 16379/2023
6. विशाल कुमार व अन्य - SLP (C) No. 16946/2023
क्या है पूरा मामला?
JSSC ने विज्ञापन संख्या 04/2015 के तहत झारखंड पुलिस में 7,272 सिपाही पदों पर भर्ती निकाली थी। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी 2,380 पद रिक्त रह गए थे, जिनमें 1,168 महिला और 1,212 अन्य श्रेणी के पद शामिल थे। अभ्यर्थियों का आरोप था कि कई अभ्यर्थियों ने लिखित परीक्षा, शारीरिक परीक्षा, चिकित्सिय परीक्षा और दस्तावेज सत्यापन तक की प्रक्रिया पूरी कर ली थी, लेकिन दूसरी मेरिट लिस्ट जारी नहीं की गई, जिससे वे नियुक्ति से वंचित रह गए। कोर्ट के 3 जून 2026 के आदेश के अनुपालन में 437 अभ्यर्थियों ने 20 अगस्त 2026 को शारीरिक सहनशक्ति परीक्षा (Physical Endurance Test) में भाग लिया। वहीं लगभग 125 अभ्यर्थियों की सूची को अंतिम रूप दिया जा रहा था, जिन्हें 21 अगस्त को शारीरिक सहनशक्ति परीक्षा में शामिल होना था। कोर्ट ने कहा कि 31 जुलाई 2026 के पत्र में निर्धारित मानदंड 3 जून के आदेश के अनुरूप नहीं हैं, इसलिए इन सभी अभ्यर्थियों को पुर्ण रूप से उत्तीर्ण माना जाए।
300 होमगार्ड अभ्यर्थियों पर भी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान लगभग 300 होमगार्ड अभ्यर्थियों का मामला भी उठा। कोर्ट ने कहा कि रिक्तियां उपलब्ध हैं और उन्होंने संतोषजनक सेवा की है, इसलिए उन्हें भी समायोजित किया जा सकता है। उनकी प्रारंभिक चयन प्रक्रिया पर विवाद नहीं किया जा सकता और उन्हें दोबारा लिखित परीक्षा में बुलाने का कोई औचित्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल इन याचिकाकर्ताओं तक ही सीमित रहेगा। यह आदेश मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों में पारित किया गया है, इसलिए इसे बाध्यकारी नजीर (Binding Precedent) के रूप में नहीं माना जाएगा। इस निर्देश के साथ कोर्ट ने सभी SLP और लंबित आवेदनों का निस्तारण कर दिया।
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