डुमरी:
करम पर्व के अवसर पर जयराम महतो ने डुमरी में लोगों को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने करम पर्व की परंपरा, जावा और ‘जावा की माई’ से जुड़े नियमों के साथ-साथ झारखंड की संस्कृति और पूर्वजों की परंपराओं पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा और रोजगार जरूरी हैं, लेकिन इसके साथ अपनी संस्कृति, भाषा, परंपरा और खेती से जुड़ाव बनाए रखना भी जरूरी है।

करम पर्व के पीछे की परंपरा का किया जिक्र
जयराम महतो ने कहा कि देश में अलग-अलग पर्व-त्योहारों के पीछे कोई न कोई संदेश और इतिहास जुड़ा हुआ है। इसी तरह करम पर्व भी झारखंड की परंपरा और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। उन्होंने लोगों से करम पर्व के नियमों और परंपराओं का पालन करने की अपील की। उन्होंने ‘जावा की माई’ की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि करम पर्व में इस परंपरा से जुड़े कई नियम हैं। उन्होंने कहा कि इन नियमों का पालन करने के पीछे परंपरा और धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है।
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‘कुंवारी बहन को माई कहना गलत परंपरा’
जयराम महतो ने अपने संबोधन में कहा कि समाज में कुंवारी बहन को ‘माई’ कहना सामान्य तौर पर उचित नहीं माना जाता, लेकिन करम पर्व की परंपरा में जावा की माई की एक अलग भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि इस परंपरा के माध्यम से बहनों और बच्चों के बीच एक विशेष सामाजिक रिश्ता स्थापित होता है। उन्होंने जावा की माई से जुड़े खान-पान और अन्य नियमों का भी जिक्र किया और लोगों से परंपराओं को समझकर उनका पालन करने की बात कही।
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‘पूर्वजों की संस्कृति और भाषा से जुड़े रहें’
जयराम महतो ने कहा कि आज की पीढ़ी को अपने पूर्वजों की संस्कृति, भाषा और परंपराओं से दूर नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवा इंजीनियर, डॉक्टर, वकील और शिक्षक बनें, यह अच्छी बात है, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ाव भी बना रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा और आधुनिक रोजगार के साथ अपनी संस्कृति और परंपरा को बचाए रखना भी जरूरी है।
खेती से नाता नहीं तोड़ने की अपील
जयराम महतो ने लोगों से खेती को नहीं छोड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि खेती और जमीन से नाता बना रहना चाहिए। अपने संबोधन में उन्होंने महाजन और कर्ज की व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि लोगों को ऐसी स्थिति से बचने के लिए अपनी खेती और आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्वजों ने ऐसी परंपराएं विकसित की थीं, जिनमें जरूरतमंदों की मदद करने और घर आए व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटाने जैसी सामाजिक भावना शामिल थी।
सुआ और कौवा का उदाहरण देकर समझाया
जयराम महतो ने सुआ और कौवा का उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि सुआ दूसरे की बोली की नकल करता है, जबकि कौवा अपनी आवाज में बोलता है। इसी उदाहरण के जरिए उन्होंने लोगों से अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा को बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि अगर लोग अपने पूर्वजों के बताए रास्ते, संस्कृति, भाषा और परंपराओं का पालन करेंगे तो अपनी पहचान और स्वतंत्रता को बनाए रख सकेंगे।
करम पर्व की दी शुभकामनाएं
संबोधन के अंत में जयराम महतो ने लोगों को करम पर्व की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि करम पर्व केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि पूर्वजों की परंपरा, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ पर्व है। उन्होंने लोगों से करम पर्व के संदेश को समझने और परंपराओं को आगे बढ़ाने की अपील की।