जीतेंद्र कुमारः
पिछले कुछ महीनों से झारखंड की राजनीतिक फिजा में महतो जी खूब चर्चा में हैं। कभी पुरुलिया की रैली से तो कभी मोटा भाई से मुलाकात के बाद। राजनीति की खिचड़ी पकने के लिए इस तरह के छौंक काफी है। समय समय पर खिचड़ी पकने की पुष्टि भी होती जा रही है। इन्हीं कारणों से हाल में हरा भी लाल हो गया। अब तो लाल कल केसरिया भी होने जा रहा है। इतना ही नहीं पिछले दिनों मौर्य का शौर्य भी जाग उठा। वह भी चलते बने। एक-एक कर पार्टी के आ..सू टपकते जा रहे हैं। ये सब अनायास ही नहीं हो रहा है। यह सब तय रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। क्योंकि केसरिया पार्टी को मालूम है कि पहले तो एक ही महतो को महत्व देना मुश्किल था। अब भला दो-दो महतो को महत्व देना कितना मुश्किल होगा। इसलिए एक को निगल ही जाना बेहतर होगा। इसी कारण आसू के केसरिया में विलय की चर्चा जोर पकड़ बैठती है। यह महतो जी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहतर भी समझाया जा रहा है।
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इन्हीं सब कारणों से झारखंड की राजनीति का नये सिरे से जोड़-घटाव, गुणा-भाग शुरू हो गया है। चुनावी गणितज्ञ अपना अपना विश्लेषण करने लगे हैं। बताने लगे हैं कि इसमें महतो जी को घाटा कहां है। 2029 के चुनाव में क्या होगा, इसका अंदाजा सबको लग रहा है। इससे पार्टी भले ही चली जाए लेकिन अपनी जान तो बच जाएगी। क्योंकि गिरिडीह, डुमरी के इलाके में एक और महतो जो ताल ठोक रहा है। उसके ताल की आवाज हर उस महतो बेल्ट में पहुंच भी रही है जहां कभी इनका सुनाई देता था। चर्चा तो यहां तक की जाने लगी है कि केसरिया पार्टी एक महतो को पहले निगल जाएगा, दूसरे महतो के साथ चुनाव के समय डील करेगा। फिर नये महतो के साथ डील की वही रणनीति होगी जो पहले वाले महतो जी के साथ हुआ करती थी। लेकिन सवाल सिर्फ महतो जी के केसरिया में मिलन का नहीं है। सवाल मिलन के बाद का है। मिलेंगे तो महतो जी रांची सीट ही मांगेंगे, इसका संदेशा सबको है। मांग स्वाभाविक भी है। क्योंकि यह महतो बहुल सीट रहा है। तभी तो भाजपा के राम केवल टहल कर चुनावी चीका पार कर जाते थे। ऐसा हुआ तो सेठ जी का कैसा होगा, यही सबसे बड़ा सवाल है।
