द फॉलोअप डेस्क
झारखंड सरकार द्वारा पिछले महीने पारित पेसा नियमावली को आज सार्वजनिक किया गया, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और आदिवासी समाज के साथ छल करने का स्पष्ट प्रयास प्रतीत होता है। सरकार ने इस कानून की आत्मा को ही कुचलने का काम किया है।
प्रमुख आपत्तियाँ इस प्रकार हैं—
सरकार ने रूढ़िवादी जनजातीय परंपराओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया है, जिसके कारण ऐसे लोगों को भी इसका लाभ मिल सकता है, जिनका इस वर्ग से कोई संबंध नहीं है। यह आदिवासी समाज के अधिकारों के साथ अन्याय है।
वन उपज, खनिज संसाधन एवं जल स्रोतों पर ग्राम सभा को नियंत्रण देने के बजाय सरकार और जिला अधिकारियों ने कई महत्वपूर्ण अधिकार अपने पास ही सुरक्षित रखे हैं। यह ग्राम सभा की संवैधानिक शक्तियों को सीधे-सीधे कुंठित करने का प्रयास है।
यह पूरी तरह स्पष्ट है कि झारखंड सरकार ने पेसा नियमावली को अपने नियंत्रण में रखने का प्रयास किया है, जबकि इसका मूल उद्देश्य ग्राम सभा को सशक्त बनाना था।
वर्तमान स्वरूप में लाया गया यह कानून 1996 के मूल पेशा कानून की भावना के विपरीत है और इसे सरकार ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए तैयार किया है। हम इसका पुरजोर विरोध करते हैं और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए हर संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक मंच पर संघर्ष जारी रहेगा।
