द फॉलोअफ डेस्क
रांची की एक विशेष अदालत ने यौन उत्पीड़न के एक मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद आरोपी युवक को बरी कर दिया है। करीब 16 महीने तक जेल में रहने के बाद अदालत ने युवक मनीष कुमार को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए रिहाई का आदेश दिया। अदालत ने माना कि मामले में लगाए गए आरोप साक्ष्यों और गवाहों के बयानों से साबित नहीं हो सके।

सुनवाई के दौरान सामने आई नई जानकारी
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि पीड़िता के माता-पिता का आपसी विवाद काफी पहले से चल रहा था। बताया गया कि विवाद के दौरान परिवार की ओर से 35 हजार रुपये की कथित मांग भी की गई थी। अदालत में पेश दस्तावेजों और गवाहों के बयानों के आधार पर यह भी सामने आया कि मामला आपसी विवाद से जुड़ा हुआ था और आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे। दरअसल मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पीड़िता के माता-पिता आरोपी सचिन कुमार की किराना दुकान से उधर सामान लेते थे। उन पर करीब 35000 रुपए का बकाया था। सचिन ने जब अपने पैसे मांगे तो विवाद खड़ा हो गया और प्रतिशोध की भावना से उसे इस गंभीर और झूठे मुकदमे में फंसा दिया गया। अदालत ने पाया कि पीड़िता की मां ने केवल अपनी धारणा और विवाद के आधार पर यह मामला दर्ज कराया।

गवाहों के बयान में दिखा विरोधाभास
सुनवाई के दौरान मुख्य गवाह और पीड़िता अदालत में किसी भी गलत काम से साफ इनकार करते रहे। वहीं पहचान से जुड़े तथ्यों को लेकर भी अभियोजन पक्ष के दावों पर सवाल उठे। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मामले में दर्ज प्राथमिकी के बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, जहां वह करीब 16 माह तक बंद रहा।अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि मजिस्ट्रेट के सामने बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग से साफ हुआ कि विशेषज्ञ मूकदर्शक बने रहे। जबकि पीड़िता की मां खुद बच्ची को सिखा रही थी कि क्या बोलना है। बयान में ट्यूटरिंग का खुलासा हुआ। बता दे की 27 फरवरी 2025 को घटना को लेकर सदर थाना में प्राथमिक की दर्ज कराई गई थी। इसमें पीड़िता की मां ने आरोप लगाया था कि पड़ोस में दुकान चलाने वाले सचिन कुमार चॉकलेट और कुरकुरे का लालच देकर बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न करता था। पुलिस ने उसे 28 फरवरी 2025 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। तब से उसने जेल में रहकर ट्रायल पूरा किया।

अदालत ने संवेदनशील जांच पर दिया जोर
फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश ने कहा कि यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में अदालतों को संवेदनशील होना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जांच और साक्ष्यों की कसौटी को कमजोर कर दिया जाए। अदालत ने कहा कि अपराध जितना गंभीर होगा, उसकी जांच भी उतनी ही निष्पक्ष, कठोर और साक्ष्य आधारित होनी चाहिए। पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने पर आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया।