द फॉलोअप, रांची
झामुमो महासचिव फागू बेसरा ने MMDRA में किए गए संशोधन पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में कहा है कि भारत एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहाँ संविधान ने संघ और राज्यों के बीच विधायी एवं वित्तीय शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया है। खनिज संपदा से संबंधित विषय भी इसी संवैधानिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं। खनिज-संपदा से समृद्ध राज्यों, विशेषकर झारखंड, के आर्थिक एवं संवैधानिक हितों के दृष्टिकोण से खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। अतः इस विधेयक पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। साथ ही फागू बेसरा ने इस संशोधन विधेयक के विरुद्ध 7 सितंबर को प्रस्तावित आंदोलन को राज्य की जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं से सफल बनाने का आह्वान किया है।

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राष्ट्रपति को लिखे पत्र में बेसरा ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय की 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने Mineral Area Development Authority & Anr. v. Steel Authority of India Ltd. & Ors. मामले में 25 जुलाई 2024 को महत्वपूर्ण निर्णय दिया। उक्त निर्णय में बहुमत ने स्पष्ट किया कि रॉयल्टी स्वयं कर (Tax) नहीं है, बल्कि खनन अधिकार के संबंध में किया जाने वाला वैधानिक/संविदात्मक भुगतान है। साथ ही संविधान की राज्य सूची की प्रविष्टि 50 (Entry 50) के अंतर्गत राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति को मान्यता दी गई। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रविष्टि 49 (Entry 49) के अंतर्गत खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने का राज्य का अधिकार अलग संवैधानिक क्षेत्र में आता है। इसी तरह संसद की विनियामक शक्ति और राज्यों की कराधान शक्ति में अंतर है। संविधान की संघ सूची की प्रविष्टि 54 के अंतर्गत संसद को खनिजों के विकास एवं विनियमन के संबंध में कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। परंतु खनिजों का विनियमन और राज्यों के कराधान अधिकार दो अलग संवैधानिक विषय हैं। इसलिए ऐसा कोई भी वैधानिक प्रावधान, जो राज्यों को संविधान द्वारा प्राप्त कराधान शक्ति के वास्तविक प्रयोग से वंचित करता हो अथवा उस शक्ति को अत्यधिक सीमित करता हो, उसकी संवैधानिक वैधता की गंभीर समीक्षा आवश्यक है।
झारखंड जैसे खनिज-संपदा सम्पन्न राज्यों के हितों की रक्षा
झारखंड की अर्थव्यवस्था और विकास में कोयला, लौह-अयस्क तथा अन्य खनिज संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। खनिज संपदा केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि राज्य के विकास, रोजगार, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जनकल्याण से जुड़े राजस्व का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए खनिज राजस्व से संबंधित राज्यों के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले किसी भी केंद्रीय कानून का परीक्षण संघीय ढाँचे, राज्य की वित्तीय स्वायत्तता तथा संविधान में निहित शक्तियों के संतुलन के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
झारखंड सहित देश के खनिज-संपदा सम्पन्न राज्यों के करोड़ों नागरिकों की अपेक्षा है कि प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त राजस्व का उपयोग स्थानीय विकास, जनकल्याण और राज्य के समग्र हित में हो। संविधान द्वारा राज्यों को प्रदान किए गए अधिकारों की रक्षा करना भारत के संघीय लोकतंत्र की मूल भावना की रक्षा करना है। इसलिए खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के संबंध में उपर्युक्त संवैधानिक एवं कानूनी प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करते हुए आवश्यक संवैधानिक हस्तक्षेप करने की जरूरत है।
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