द फॉलोअप, रांची
जेटेट की परीक्षा नियमावली में क्षेत्रीय भाषा की सूची में मगही, भोजपुरी और अंगिका शामिल नहीं हो सका। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर और ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय की मांग सरकार ने अनसुनी कर दी। कैबिनेट की बैठक में दीपिका पांडेय सिंह पर मुख्यमंत्री की उपस्थिति में झामुमो मंत्री भारी पड़ गए। कांग्रेस इस घटना के बाद मर्माहत और उधेरबुन में है। कांग्रेस के मंत्रियों, विधायकों और सांसदों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है, लेकिन पार्टी के सेकेंड लेयर के नेताओं को जरूर उकसा दिया है। पार्टी के शीर्ष नेताओं की सहमति के बाद कल कांग्रेस के कई नेताओं ने तीनों भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल करने की मांग दुहरायी। इनमें आलोक दूबे, राजीव रंजन प्रसाद, डॉ राजेश गुप्ता, शशिभूषण राय, निरंजन पासवान और आदित्य विक्रम जायसवाल शामिल हैं।

इन नेताओं ने तर्क दिया है कि 2012 और 2016 की जेटेट परीक्षा में तीनों भाषाएं शामिल थी। उनका तर्क है कि पलामू और संथालपरगना प्रमंडल के अलावा बोकारो, धनबाद, कोडरमा और चतरा, जैसे जिलों में बहुसंख्यक लोग इन भाषाओं को बोलते हैं। इसलिए इन भाषाओं को सूची से बाहर करना स्थानीय अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने सरकार के मंत्रियों से मिल कर इन भाषाओं को सूची में शामिल करने की मांग कही है। सरकार पर दबाव बनाने की घोषणा की है। लेकिन सवाल यह है कि पार्टी के लिए यह इतना ही बड़ा मुद्दा है तो बड़े नेता चुप क्यों हैं। प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश प्रभारी, सांसद, मंत्री और विधायकों ने क्यों चुप्पी साध ली है। सूत्रों का कहना है कि इसके पीछे एक ही कारण है। पार्टी के भीतर खुद इस मुद्दे पर दो फाड़ है। पार्टी के आदिवासी विधायक भी नहीं चाहते कि भोजपुरी, मगही और अंगिका शामिल हो। क्योंकि उनके विधानसभा क्षेत्र में भाषाय़ी स्थिति पलामू, गोड्डा, धनबाद और बोकारो से अलग है।

अब कांग्रेस के इन नेताओं को कौन समझाए कि कैबिनेट की बैठक में उनकी पार्टी के मंत्रियों की नहीं सुनी गयी तो वही मंत्री उनकी क्या सुनेंगे। तब जबकि कैबिनेट की बैठक में झामुमो के सारे मंत्रियों ने क्षेत्रीय भाषा की सूची से मगही, भोजपुरी और अंगिका को बाहर रखने की वकालत की थी। इस तर्क के बहाने दीपिका पांडेय सिंह की मांग को खारिज कर दिया कि जेटेट की परीक्षा में वैसे ही 10 साल की देरी हो चुकी है, अब और देर करना अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा। लेकिन सच यह है कि कांग्रेस अभी खुद उधेर बुन में है। वह समझ ही नहीं पा रही है कि उसे झारखंड में राजनीति की कौन सी रेखा खींचनी है। कांग्रेस अवैध खनन को लेकर जिलों में अपनी सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन की बात करती है। राज्य समन्वय समिति के गठन की मीडिया के माध्यम से मांग करती है। राज्यसभा में एक सीट देने की मांग करती है। अपनी ही सरकार को घेरती है। लेकिन मीडिया के माध्यम से। जबकि इन मांगों को लेकर उसे मुख्यमंत्री और गठबंधन के शीर्ष नेताओं के सामने रखनी चाहिए।
