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चाईबासा मेडिकल कॉलेज और CRPF कैंप में टेंडर की शर्तों को ताक पर रख कर हो रहा केबलिंग का काम

चाईबासा मेडिकल कॉलेज और CRPF कैंप में टेंडर की शर्तों को ताक पर रख कर हो रहा केबलिंग का काम

द फॉलोअप, रांची
टेंडर प्रक्रिया के तय मानदंडों को ताक पर रख कर चाईबासा मेडिकल कॉलेज और जादूगोड़ा स्थित CRPF कैंप में बिजली के तार बिछाने का मामला सामने आया है। उलझरी ग्रिड से चाईबासा मेडिकल कॉलेज तक 33 केवी डेडिकेटेड फीडर और भूमिगत केबलिंग परियोजना के स्टीमेट को 9 जनवरी 2025 को स्वीकृति दी गयी थी। इसकी अनुमानित लागत 5.67 करोड़ है। तय स्टीमेट के तहत ग्रिड से मेडिकल कॉलेज तक 33 केवी लाइन के लिए निर्धारित मानदंड के तहत सिर्फ पॉलीकैब, हेवेल्स या केआई का केबल लगाया जाना है। लेकिन एक किलोमीटर तक बिछाए गए डबल सर्किट (दो किलोमीटर) में 11 केवी का केबल लगा दिया गया। वह भी लेजर नामक कंपनी का। जबकि स्टीमेट में इस कंपनी का जिक्र ही नहीं था। मामला तब उजागर हुआ जब सदर अस्पताल चाईबासा के लिए गोदाम में रखे गए 11 केवी के तार की खोज की गयी। पता चला कि 11 केवी के तार का उपयोग तो चाईबासा मेडिकल कॉलेज तक बिछाए जा रहे केबल की जगह कर दिया गया। भ्रष्टाचार और अनियमितता के उजागर होने के बाद अब उस केबल को उखाड़ा जा रहा है। वहां अब नये सिरे से 33 केवी के केबल बिछाया जाएगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए अधीक्षण अभियंता संजय कुमार ने पत्र लिख कर ( 1634 से 1/9/2026) गलत मैटेरियल लगाए जाने पर कई सवाल उठाए हैं।


कुछ इसी तरह की स्थिति डिपॉजिट वर्क के तहत जादूगोड़ा स्थित CRPF कैंप को बिजली उपलब्ध कराने से जुड़ी दूसरी परियोजना की भी है। इसकी अनुमानित लागत करीब 11.32 करोड़ रुपये है। इस परियोजना में प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति और वित्तीय अधिकारों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि परियोजना को जिस स्तर पर स्वीकृति दी गई, वहां संबंधित अधिकारी के पास इतनी राशि की स्वीकृति देने का अधिकार ही नहीं था। इन परियोजनाओं में वर्क को कई टुकड़ों में बांट कर स्वीकृति और कार्यादेश देने का दूसरा खेल किया गया है। जबकि ऐसा करने से पहले या तय मानदंड के इतर किसी उपकरण या तार को लगाने से पहले नियमानुसार झारखंड बिजली वितरण निगम के सीएमडी की स्वीकृति आवश्यक बतायी जाती है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इस खेल में जीएम अजीत कुमार की भूमिका काफी संदिग्ध बतायी जा रही है। इसके अलावा तय समय सीमा से कम अवधि में टेंडर निकाल कर की गयी अनिमितता को भी इस गड़बड़ी का एक मुख्य कारक माना जा रहा है। अल्पावधि में टेंडर निकालने से पहले क्या शीर्ष स्तर पर इसकी स्वीकृति ली गयी,यह अलग जांच का विषय है।


कुछ मूल सवाल जो गड़बड़ी को रेखांकित करते हैं
दोनों परियोजनाओं की प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृति किस अधिकारी/प्राधिकारी ने दी?  
टेंडर की अवधि कितने दिनों की थी और इसे निर्धारित करने का आधार क्या था?  
तकनीकी स्पेसिफिकेशन में कोई बदलाव किया गया या नहीं?  
यदि बदलाव हुआ तो किसकी अनुमति से हुआ?  
केबल की गुणवत्ता की जांच किस एजेंसी ने की?  
कितनी कंपनियों ने टेंडर में भाग लिया और कितनी तकनीकी रूप से पात्र पाई गईं?  
परियोजना की स्वीकृत लागत और वास्तविक भुगतान में कितना अंतर है?  
क्या परियोजना को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर कार्यादेश जारी किया गया?  
दोनों मामलों में किसी विभागीय जांच या ऑडिट की गई है या नहीं?


 

Tags - JBVNL Chaibasa Medical College CRPF Camp Cabling