सिमडेगा
JSLPS की योजनाओं और आजीविका कार्यक्रमों से जुड़कर सिमडेगा बानो प्रखंड के कानारोवा गांव की बिरसमुनी देवी आज ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. कभी सामान्य ग्रामीण महिला के रूप में जीवन यापन करने वाली बिरसमुनी देवी आज हार्डनिंग सेंटर संचालन और मुर्गी पालन व्यवसाय के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त होकर अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं.
शुरुआत में 10 हजार रुपये का हुआ मुनाफा
बिरसमुनी देवी ने वर्ष 2015 में “प्यारी आजीविका महिला समूह” से जुड़कर अपने सामाजिक और आर्थिक सफर की शुरुआत की. समूह में सचिव पद की जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने महिलाओं को संगठित करने और समूह की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके बाद वर्ष 2016 में उनका चयन कृषि सखी के रूप में हुआ. इस दौरान उन्हें विभाग द्वारा मुर्गी पालन का प्रशिक्षण दिया गया, जिसने उनके जीवन को नई दिशा दी. प्रशिक्षण के बाद बिरसमुनी देवी ने जेएसएलपीएस के सहयोग से हार्डनिंग सेंटर में मुर्गियों के रख-रखाव, चूजा प्रबंधन और पोषण संबंधी विस्तृत जानकारी प्राप्त की. प्रशिक्षण और अनुभव के आधार पर उन्होंने अपने गांव में हार्डनिंग सेंटर शुरू करने का निर्णय लिया. शुरुआत में उन्होंने आशील नस्ल के 1000 चूजों को सेंटर में रखा. लगभग 20 से 30 दिनों तक पालन-पोषण के बाद जब चूजों की बिक्री हुई, तो उन्हें करीब 10 हजार रुपये का मुनाफा प्राप्त हुआ. पहली सफलता ने उनके आत्मविश्वास को और मजबूत किया.
50 से 60 हजार की हो रही सालाना कमाई
पहली कमाई से उत्साहित होकर उन्होंने दोबारा चूजे मंगाकर अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया. दूसरी बार भी उन्हें अच्छा लाभ हुआ. धीरे-धीरे यह कार्य उनके लिए नियमित व्यवसाय बन गया. वर्तमान में वह वर्ष में चार बार हार्डनिंग सेंटर के माध्यम से चूजा पालन और बिक्री का कार्य कर रही हैं. केवल चूजा पालन तक सीमित न रहकर बिरसमुनी देवी ने मुर्गी दाना तैयार करने का कार्य भी शुरू किया. आज वह अपने गाँव के साथ-साथ आसपास के अन्य हार्डनिंग सेंटरों में भी मुर्गी दाना की आपूर्ति कर रही हैं. हाल ही में उन्होंने छत्तीसगढ़ में लगभग 8 क्विंटल मुर्गी दाना की सप्लाई कर 6 हजार रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित की. चूजा पालन, मुर्गी दाना निर्माण और बिक्री के माध्यम से बिरसमुनी देवी सालाना लगभग 50 से 60 हजार रुपये तक की आय प्राप्त कर रही हैं. इससे न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि वह गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी रोजगार और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा बन गई हैं.

प्रशिक्षण और मार्गदर्शन से बनी आत्मनिर्भर
बिरसमुनी देवी का कहना है कि समूह से जुड़ने के बाद उन्हें जीवन में नई दिशा मिली. प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के कारण उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्राप्त हुआ. वह अपनी सफलता का श्रेय जेएसएलपीएस, आजीविका महिला समूह और प्रशिक्षण संस्थाओं को देती हैं. आज कानारोवा गाँव में बिरसमुनी देवी की पहचान एक सफल और प्रगतिशील महिला किसान के रूप में हो रही है. उनकी मेहनत, लगन और आत्मविश्वास यह साबित करते हैं कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएँ भी आत्मनिर्भर बनकर समाज में नई मिसाल कायम कर सकती हैं.
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