द फॉलोअप, रांची
6 सितंबर 2026 की मनहूस सुबह झारखंड की राजनीति के एक ऐसे अध्याय को लील गई, जिसकी स्याही माटी के संघर्ष, खून-पसीने और निस्वार्थ निष्ठा से बनी थी। गिरिडीह से विधायक और राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का 56 वर्ष की आयु में कार्डियक अरेस्ट से निधन सिर्फ एक राजनेता का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसे बेटे की विदाई है, जिसने अपना पूरा जीवन अपनी 'माटी' के नाम लिख दिया। मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले सुदिव्य की पिछली चार-पांच पीढ़ियां सुकून की सरकारी नौकरी में थीं। घर चलाने की जिम्मेदारियां सिर पर थीं, लेकिन 80-90 के दशक में उत्तर बिहार में पढ़ाई के दौरान जब सहपाठी तंज कसते थे—"क्या अलग राज्य बना लोगे?"—तो यह सवाल उनके स्वाभिमान पर सीधे चोट करता था। इसी ताने ने उनके भीतर झारखंड की अस्मिता के लिए एक ऐसी आग भड़काई, जिसने उनके लिए व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के मायने हमेशा के लिए खत्म कर दिए।

1989 का साल उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट
1989 का साल उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बना। डीएसपी बरनाड कीचिया के आवास पर उनकी मुलाकात 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन से हुई। गुरुजी ने इस युवा के कंधे पर हाथ रखकर सिर्फ इतना कहा, "अगर तुम्हारे जैसे पढ़े-लिखे लोग आंदोलन में नहीं आएंगे, तो इसका विस्तार कैसे होगा?" यह महज एक सवाल नहीं, बल्कि एक रूहानी आह्वान था। सुदिव्य ने खुद को अलग राज्य के आंदोलन की भट्टी में झोंक दिया। परिवार में बगावत लाजिमी थी; पिता बेटे के भविष्य को लेकर बेहद नाराज और आशंकित रहते थे। तब खुद शिबू सोरेन उनके घर पहुंचे और पिता के पैर छूकर जो कहा, वह आज भी भावुक कर देता है—"आपका बेटा मांग के ले जा रहे हैं, कुछ बना के देंगे।" उस एक वाक्य ने पिता के सारे तनाव हर लिए और झारखंड को एक सच्चा सिपाही मिल गया।
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झंडा ढोने और दीवारें लिखने वाले एक आम कार्यकर्ता
सुदिव्य का सफर किसी कॉरपोरेट नेता का नहीं, बल्कि झंडा ढोने और दीवारें लिखने वाले एक आम कार्यकर्ता का रहा है। 1991 के गोड्डा लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी की हत्या के बाद मचे बवाल के बीच भी वह क्षेत्र में डटे रहे। 2003 से 2010 तक जिलाध्यक्ष रहकर उन्होंने संगठन की जड़ों को गांव-गांव तक सींचा। 2009 (छठे स्थान) और 2014 (दूसरे स्थान) के चुनावों में मिली हार ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि फौलाद बना दिया। आखिरकार 2019 और फिर 2024 में भाजपा के अभेद्य दुर्ग गिरिडीह में कमल को हराकर उन्होंने साबित कर दिया कि वे माटी के सबसे मजबूत लाल हैं। सुदिव्य शिबू सोरेन में अपना पिता देखते थे। उनका जुड़ाव इस कदर गहरा था कि वे पहले ही भांप लेते थे कि बाबा का अगला कदम क्या होगा या संगठन की किसी समस्या का वे क्या समाधान देंगे। जब उनके सोचे हुए उपाय गुरुजी के आदेशों से हूबहू मिलते, तो सुदिव्य का मन एक आज्ञाकारी बेटे-सा खुशी से भर उठता था। हालांकि, वह खुद बेहद मासूमियत से यह स्वीकार करते थे कि दशकों के तजुर्बे के बाद भी वे कई बार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के रणनीतिक फैसलों और उनके 'मूव' को नहीं पकड़ पाते थे।

चुनावी प्रबंधन की ऐसी अद्भुत मिसाल पेश की
संगठन और हेमंत सोरेन के प्रति उनका समर्पण घाटशिला उपचुनाव में अपने चरम पर दिखा। उन्होंने वहां चुनावी प्रबंधन की ऐसी अद्भुत मिसाल पेश की कि जीत का अंतर ऐतिहासिक हो गया। पहली बार लगा कि झामुमो किसी राष्ट्रीय पार्टी की तर्ज पर पूरा मैनेजमेंट कर रही है। उम्मीदवार को पसीना नहीं बहाना पड़ा और हेमंत व कल्पना सोरेन महज स्टार प्रचारक की भूमिका में निश्चिंत रहे। जब घर को पालना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए थी, तब इस शख्स ने झारखंड की माटी चुनी। आज उनका जाना झामुमो के लिए एक रणनीतिकार खोना भर नहीं है, बल्कि एक ऐसा अभिभावक खोना है, जिसकी धड़कनें सिर्फ झारखंड के लिए चलती थीं। आंदोलन के उस जुनूनी सिपाही को माटी का अश्रुपूर्ण जोहार!

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