अभिषेक सिंह
राजनीति में विरोध विचारों का होना चाहिए, शब्दों का नहीं। लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मतभेद व्यक्त करने के लिए भाषा की मर्यादा को भूल जाना किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए उचित नहीं हो सकता। राजनीतिज्ञों के शब्द केवल उनके व्यक्तिगत विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि समाज में राजनीतिक संस्कृति की दिशा भी तय करते हैं। राजनीतिज्ञों को युवाओं, महिलाओं और क्षेत्र के उत्थान एवं विकास की बात करनी चाहिए। वर्तमान में जो जनप्रतिनिधि चुनकर आए हैं, उनकी जिम्मेदारी सबसे अधिक होती है कि वे अपने क्षेत्र के विकास के लिए काम करें। मिथिलेश ठाकुर (Mithilesh Thakur) ने गढ़वा में विकास की लंबी लकीर खींची है। गढ़वा, जो कभी सबसे पिछड़े विधानसभा क्षेत्रों में गिना जाता था, उसे उन्होंने अपने एक ही कार्यकाल में आसपास के जिलों से आगे ले जाने का कार्य किया। यह दूसरे जनप्रतिनिधियों (Public Representatives) के लिए सीख है कि किस तरह विकास और क्षेत्र के उत्थान को प्राथमिकता दी जा सकती है। इसके विपरीत, गढ़वा के वर्तमान विधायक (MLA) सत्येंद्र तिवारी (Satyendra Tiwari) अपने बड़बोलेपन और लगातार अमर्यादित शब्दों के इस्तेमाल को लेकर चर्चा में रहते हैं। ऐसी भाषा न केवल सुनने में अशोभनीय लगती है, बल्कि कई बार उसे सार्वजनिक रूप से लिखना भी उचित नहीं लगता। हद तो तब हो जाती है, जब सत्येंद्र तिवारी मुख्यमंत्री (Chief Minister) हेमन्त सोरेन (Hemant Soren) की वृद्ध बीमार मां तक के बारे में अपशब्द बोल देते हैं।
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मूल्यांकन घोषणाओं और भाषणों से नहीं, बदलावों से होना चाहिए
विकास का मूल्यांकन केवल घोषणाओं और भाषणों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले बदलावों से होना चाहिए। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, पेयजल, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं किसी भी क्षेत्र के वास्तविक विकास के महत्वपूर्ण आधार हैं। जनप्रतिनिधि का कद उसके शब्दों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आए सकारात्मक बदलावों से तय होता है। किसी जनप्रतिनिधि के कार्यकाल का मूल्यांकन करते समय राजनीतिक पसंद-नापसंद से ऊपर उठकर यह देखना जरूरी है कि उसके कार्यकाल में क्षेत्र को क्या मिला और जनता के जीवन में कितना बदलाव आया। लोकतंत्र में जनता के पास अपने प्रतिनिधियों के काम का मूल्यांकन करने का अधिकार है और यही लोकतांत्रिक जवाबदेही की सबसे बड़ी कसौटी है। हाल के दिनों में गढ़वा के भाजपा विधायक और तीन बार विधायक रह चुके सत्येंद्र तिवारी के बयान को लेकर जिस तरह की भाषा सामने आई है, उसने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है- क्या राजनीति में अब गाली-गलौज और निम्न स्तरीय भाषा को सामान्य मान लिया जाए? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भाजपा स्वयं को संस्कार, अनुशासन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रेरित राजनीतिक दल के रूप में प्रस्तुत करती है। ऐसे में जब उसी दल का कोई वरिष्ठ जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंच पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या जनप्रतिनिधियों के लिए राजनीतिक मर्यादा के कोई मानदंड नहीं होने चाहिए?
राजनीतिक दृष्टिकोण पर कठोर सवाल उठाने का पूरा अधिकार
लोकतंत्र में किसी भी नेता को अपने विरोधी की नीतियों, फैसलों और राजनीतिक दृष्टिकोण पर कठोर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन व्यक्तिगत अपमान, आपत्तिजनक भाषा और असम्मानजनक टिप्पणियां राजनीतिक बहस को मुद्दों से हटाकर व्यक्ति-केंद्रित विवाद में बदल देती हैं। इससे जनता के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाते हैं। तीन बार विधायक चुने जा चुके जनप्रतिनिधि से जनता की अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से अधिक होती हैं। लंबे सार्वजनिक अनुभव के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। ऐसे जनप्रतिनिधियों के शब्दों और आचरण को आम नागरिक सामान्य राजनीतिक बयान की तरह नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन के उदाहरण के रूप में देखते हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात तब होती है, जब गलत भाषा या अमर्यादित बयान पर सवाल उठाने के बजाय पार्टी के नेता और कार्यकर्ता उसका बचाव करने में जुट जाते हैं। किसी नेता का समर्थन करना अलग बात है और उसकी हर बात का बचाव करना अलग। राजनीतिक निष्ठा का अर्थ यह नहीं हो सकता कि हम गलत को भी सही ठहराने लगें। इसके विपरीत, झामुमो के पूर्व मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर ने लंबे समय से सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक शुचिता और मर्यादा को महत्व दिया है। राजनीतिक विरोधियों के साथ मतभेद हो सकते हैं, लेकिन भाषा की गरिमा बनाए रखना लोकतांत्रिक राजनीति की बुनियादी आवश्यकता है। स्वस्थ राजनीतिक संगठन वही होता है, जहां नेतृत्व के प्रति सम्मान के साथ-साथ आत्ममंथन की भी गुंजाइश हो। अपने ही पक्ष के नेता की गलत बात पर सवाल उठाना विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और संगठनात्मक जिम्मेदारी का हिस्सा माना जाना चाहिए। इससे राजनीति में जवाबदेही मजबूत होती है और सार्वजनिक जीवन में विश्वास बढ़ता है।
जेल जाने जैसे कृत्यों को उचित ठहराना समाज के लिए बेहद चिंताजनक
खुलेआम किसी चुने हुए विधायक द्वारा चोरी और जेल जाने जैसे कृत्यों को उचित ठहराना समाज के लिए बेहद चिंताजनक संदेश है। जनप्रतिनिधि समाज के लिए उदाहरण होते हैं। उनके आचरण और बयानों का युवाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि गलत कार्यों को सही ठहराया जाएगा, तो युवाओं के मन में भी ऐसे कृत्यों के प्रति गलत धारणा बन सकती है। यह सामाजिक मूल्यों को कमजोर करने और समाज में नकारात्मकता का विष घोलने जैसा है। आज सोशल मीडिया के दौर में नेताओं का एक छोटा-सा बयान भी कुछ ही समय में हजारों और लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में बोले गए शब्दों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। जो बात एक मंच तक सीमित रहती थी, वह आज युवाओं के मोबाइल फोन तक पहुंचकर राजनीतिक संवाद का हिस्सा बन जाती है। पलामू प्रमंडल की राजनीतिक परंपरा हमेशा से गंभीर विमर्श, संघर्ष और जनसरोकारों की राजनीति की रही है। यह वह क्षेत्र है, जहां राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और क्षेत्र के प्रति जिम्मेदारी के रूप में भी देखा गया है। ऐसे क्षेत्र की पहचान अगर उसके जनप्रतिनिधियों के व्यवहार और भाषा से बनेगी, तो हमें यह भी सोचना होगा कि आने वाली पीढ़ी इन नेताओं से क्या सीख रही है? आज बड़ी संख्या में युवा अपने-अपने राजनीतिक दलों के नेताओं और विधायकों से प्रेरित होकर राजनीति में आ रहे हैं। वे अपने नेताओं को केवल भाषण देते हुए नहीं देखते, बल्कि उनके व्यवहार, शब्दों और सार्वजनिक आचरण से राजनीतिक संस्कार भी ग्रहण करते हैं। अगर उनके सामने गाली-गलौज और व्यक्तिगत कटाक्ष को राजनीति का सामान्य हिस्सा बना दिया जाएगा, तो उनसे बेहतर राजनीतिक संस्कृति की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस क्षेत्र की राजनीति में जनआंदोलनों, सामाजिक संघर्षों और जनता के अधिकारों के लिए आवाज उठाने की लंबी परंपरा रही है। इसलिए यहां की राजनीतिक बहस का स्तर केवल नेताओं की व्यक्तिगत बयानबाजी से नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों, विकास और सामाजिक सरोकारों से तय होना चाहिए।

गढ़वा की जनता को भी स्वयं से पूछना चाहिए
क्षेत्र की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनती। उसकी पहचान वहां के लोगों, सामाजिक संस्कृति और जनप्रतिनिधियों के आचरण से भी बनती है। ऐसे में यह सवाल गढ़वा की जनता को भी स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या वह अपने क्षेत्र की पहचान ऐसी भाषा और ऐसे राजनीतिक व्यवहार से बनते हुए देखना चाहती है? यह सवाल किसी एक पार्टी के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। यह राजनीति के स्तर और लोकतांत्रिक संस्कार का सवाल है। हमें पार्टी और विचारधारा से ऊपर उठकर यह तय करना होगा कि हम कैसी राजनीति चाहते हैं। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, चुनाव परिणाम बदलते रहते हैं और सत्ता का स्वरूप भी बदलता रहता है, लेकिन किसी क्षेत्र की सामाजिक छवि लंबे समय तक बनी रहती है। इसलिए वर्तमान पीढ़ी के जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल अपने कार्यकाल तक सीमित नहीं है- उनके आचरण का प्रभाव आने वाले वर्षों की राजनीतिक संस्कृति पर भी पड़ता है। राजनीतिक विरोध होना चाहिए, तीखा विरोध भी होना चाहिए, सरकार की नीतियों की आलोचना भी होनी चाहिए और जनप्रतिनिधियों से सवाल भी पूछे जाने चाहिए। लेकिन इन सबके बीच भाषा की मर्यादा बनी रहनी चाहिए।

राजनीति में गाली-गलौज का स्थान नहीं हो सकता
राजनीति में गाली-गलौज का स्थान नहीं हो सकता। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन अमर्यादित भाषा लोकतंत्र की गरिमा को कमजोर करती है। जनता को भी विकास और बयानबाजी के बीच अंतर समझना होगा। सवाल यह होना चाहिए कि कौन जनप्रतिनिधि जनता के वास्तविक मुद्दों को सदन और सरकार तक पहुंचा रहा है, कौन क्षेत्र के विकास की बात कर रहा है और कौन राजनीतिक बहस को व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर रहा है। यही सवाल लोकतंत्र को मजबूत करते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भाषा और सार्वजनिक आचरण की स्पष्ट मर्यादा तय करें। क्योंकि राजनीति केवल आज की लड़ाई नहीं है- यह आने वाली पीढ़ियों के राजनीतिक संस्कार भी तय करती है।
अंततः राजनीति में असहमति रहे, संघर्ष रहे, विचारों की टकराहट रहे, लेकिन संवाद की भाषा सम्मानजनक रहे। गढ़वा की राजनीति में भी विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई और जनता की समस्याएं मुख्य विषय बनें- यही लोकतांत्रिक राजनीति की सार्थक दिशा हो सकती है।
(नोट- ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं, इसका ‘द फॉलोअप’ से कोई संबंध नहीं है)