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इज ऑफ डूइंग बिजनेस यानि ग्रामसभा ‘माई फुट’ 

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सुधीर पाल 
प्रधानमंत्री से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को इज ऑफ डूइंग बिजनेस का मुहावरा पसंद है। इज ऑफ डूइंग बिजनेस यानि एक ऐसी दुनिया की कल्पना है जिसमें प्रक्रियाएं तेज़ हों, अनापत्ति प्रमाणपत्र ऑनलाइन मिलें, और ज़मीन के कागज़ एक क्लिक पर ट्रांसफर हो जाएं।
इज ऑफ डूइंग बिजनेस विश्व बैंक द्वारा तैयार की जाने वाली एक वैश्विक रैंकिंग है, जिसमें किसी देश में व्यापार शुरू करने, संचालन, लाइसेंसिंग, टैक्सेशन, अनुबंध प्रवर्तन, और दिवालियापन प्रक्रिया जैसी व्यवस्थाओं की सरलता को मापा जाता है। इसका उद्देश्य निवेशकों को आकर्षित करना और आर्थिक गतिविधियों को सुगम बनाना है। अगर कोई देश विश्व बैंक की सूचियों में ऊपर चढ़े लेकिन अपने जंगल, नदियाँ और लोगों की आवाज़ खो बैठे—तो क्या वह सचमुच "विकसित" हो पाया?
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विकास की गति बढ़ाने के लिए निवेश, औद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे का विस्तार अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य से सरकारों ने इज ऑफ डूइंग बिजनेस को प्राथमिकता दी है, ताकि देश में व्यापार करना आसान हो, निवेश आकर्षित हो और आर्थिक विकास को गति मिले। दूसरी ओर लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'ग्रामसभा' और स्थानीय समुदायों के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, खासकर अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी बहुल इलाकों में, जहाँ संसाधनों पर स्थानीय लोगों का परंपरागत स्वामित्व रहा है। इज ऑफ डूइंग बिजनेस ने भारत को वैश्विक निवेश नक्शे पर तो उभारा, लेकिन इज ऑफ लिविंग को नज़रंदाज़ कर दिया। लोकतंत्र सिर्फ मतदाता पहचान पत्र नहीं है, वह ग्रामसभा की सामूहिक चेतना में बसता है।


संतुलन की जरूरत
अगर विकास के रास्ते पर लोकतंत्र की आवाज़ बाधा लगे, तो रास्ते को नहीं, सोच को बदलना होगा। आज आवश्यकता है एक ऐसे मॉडल की, जिसमें इज ऑफ डूइंग बिजनेस हो, लेकिन ग्रामसभा की असहमति को विकास की गति नहीं, उसकी दिशा बताने वाला मानें। लैंड कान्फ्लिक्ट वाच की ताजा आंकड़ों के मुताबिक भूमि अधिग्रहण तथा जंगल की जमीन को खनन एवं अन्य कारोबार के लिए इस्तेमाल किये जाने के प्रस्तावों को लेकर छोटे-बड़े 948 संघर्ष चल रहे है। एक करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हैं और साढ़े तीन लाख करोड़ से ज्यादा का पूंजी निवेश फंसा हुआ है। करीब 47 लाख हेक्टेर से ज्यादा जमीन अधिग्रहण की चपेट में है।       ये सारी परियोजनाएँ ग्रामसभा की स्वीकृति के कारण रुकी या विलंबित हुई है। इसमें खासकर खनिज और बिजली क्षेत्रों से संबंधित परियोजनाएं है। झारखंड में कई कोल परियोजनाएँ ग्रामसभा की असहमति के कारण रुकीं। स्थानीय लोगों ने विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति और पारंपरिक अधिकारों के हनन का हवाला दिया। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ और बस्तर जैसे क्षेत्रों में ग्रामसभा की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण के प्रयासों का स्थानीय लोगों ने विरोध किया, जिससे परियोजनाएँ लंबित पड़ीं।
2018-19 में 60% से अधिक पर्यावरणीय मंजूरियाँ बिना ग्रामसभा की पूर्ण सहमति के दी गईं, जिस पर सामाजिक संगठनों ने आपत्ति जताई है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार, भूमि अधिग्रहण और ग्राम सभाओं की स्वीकृति में देरी भारत में निवेश की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। नीति आयोग की रिपोर्ट (2022) के अनुसार  आदिवासी क्षेत्रों में 70% से अधिक लोग मानते हैं कि ग्रामसभा के बिना परियोजनाएँ उनके हितों के विरुद्ध होती हैं।
भारत ने पिछले एक दशक में इज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में जबरदस्त छलांग लगाई है। 2014 में भारत की रैंक 142 थी, जो 2019 तक 63 पर पहुँच गई। यह सुधार मुख्यतः प्रक्रियाओं के सरलीकरण, डिजिटलाइजेशन और निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल बनाने के कारण हुआ। 


गाँव का मतलब केवल भूगोल नहीं 
लेकिन जब बात खनिज, बिजली, सड़क, डैम जैसी परियोजनाओं की आती है, तो ग्रामसभा और पेसा कानून को अक्सर रुकावट के रूप में देखा जाता है। सरकारें और कॉरपोरेट मानते हैं कि ग्रामसभा की स्वीकृति निवेश की अनिश्चितता बढ़ाती है, जिससे परियोजनाएँ अटक जाती हैं। ग्रामसभा और पेसा संवैधानिक निकाय हैं और लोकतंत्र की जड़ें हैं। पेसा कानून (1996), अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को भूमि, जंगल, और संसाधनों पर निर्णय का अधिकार देता है। वनाधिकार कानून 2006, आदिवासियों और स्थानीय समुदायों को वन अधिकार और संसाधनों पर स्वामित्व का मार्ग प्रशस्त करता है। ग्रामसभा स्थानीय लोगों की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण, खनन, या विकास परियोजनाओं को रोक सकती है। ओडिशा के नियमगिरि पहाड़ों में वेदांता कंपनी की बॉक्साइट खनन परियोजना ग्रामसभाओं की असहमति के कारण सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक दी गई। यहाँ 12 में से 12 ग्रामसभाओं ने परियोजना के खिलाफ मतदान किया, जिससे आदिवासी अधिकारों की जीत हुई।
इज ऑफ डूइंग बिजनेस सुधारों के तहत सरकारें और कॉरपोरेट सेक्टर ग्रामसभा की मंजूरी को अक्सर "रुकावट" मानते हैं। उनका तर्क है कि ग्रामसभा की सहमति में समय लगता है, जिससे परियोजनाएँ विलंबित होती हैं। कभी-कभी ग्रामसभा बाहरी दबाव या राजनीतिक कारणों से परियोजनाओं का विरोध करती है। निवेशकों को अनिश्चितता रहती है कि मंजूरी मिलेगी या नहीं। स्थानीय समुदायों मान्यता है कि विकास परियोजनाएँ अक्सर उनकी भूमि, जंगल, जल और आजीविका छीन लेती हैं। पर्यावरणीय क्षति, विस्थापन और पारंपरिक जीवनशैली पर खतरा। ग्रामसभा के बिना निर्णय लेने से लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन होता है। भूमि अधिग्रहण का इतिहास बेहद डरावना है। सिर्फ झारखंड की बात करें तो कोयला, उधयोग तथा डैम से विस्थापित हजारों लोग मुआवजा और बुनियादी हकों के लिए लड़ रहे हैं 
ग्रामसभा  को साझेदार बनाइये 
इज ऑफ डूइंग बिजनेस और ग्रामसभा के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना भारत के सतत विकास के लिए अनिवार्य है। जहाँ निवेश और विकास जरूरी हैं, वहीं स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारदर्शिता और पर्यावरणीय लोकतंत्र भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। 
सरकार को चाहिए कि परियोजना की शुरुआत में ही ग्रामसभा से संवाद, उनकी चिंताओं का समाधान करे। परियोजनाओं की पूरी जानकारी, संभावित लाभ-हानि, पर्यावरणीय प्रभाव का खुलासा ग्राम सभाओं सहित नागरिक संगठनों के पास करे। ग्रामसभा की मंजूरी के लिए स्पष्ट और समयबद्ध प्रक्रिया बनाए ताकि अनावश्यक विलंब न हो। स्थानीय लोगों को परियोजना से रोजगार, मुआवजा, पुनर्वास और सामाजिक विकास के अवसर केवल एम ओ यू का हिस्सा नया हो बल्कि यह जमीन पर पूर्णतः लागू हो। और स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन, जिसमें ग्रामसभा की भागीदारी हो अभिशासन का हिस्सा हो। इससे न सिर्फ निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि लोकतंत्र की जड़ें भी मजबूत होंगी।


वैश्विक अनुभव से सबक लीजिए 
बुर्कीना फासो में खनिजों को बहुत बड़ा जखीरा है। पश्चिमी देश बड़े पैमाने पर दोहन करते थे। बुर्कीना फासो के राष्ट्रपति इब्राहिम ट्रोरे समुदायों के हित में कई कदम उठाए। दो सोने की खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इंटरनेशनल मोनेटरी फंड और वर्ल्ड बैंक से वित्तीय मदद लेने से मना कर दिया। मकसद था ये संदेश देना कि बुर्कीना फासो पश्चिमी देशों की मदद बिना भी विकास कर सकता है। ब्राजील ने तय किया है कि अमेजन क्षेत्र में स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना खनन परियोजनाएँ नहीं चलाई जा सकती। ऑस्ट्रेलिया में आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए ‘लैंड काउंसिल्स’ की भागीदारी अनिवार्य है। कनाडा में फर्स्ट नेशंस समुदायों की सहमति के बिना संसाधन दोहन संभव नहीं। भारत को भी वैश्विक अनुभवों से सीखते हुए स्थानीय लोकतंत्र और निवेश के बीच संतुलन बनाना चाहिए। इससे न केवल सामाजिक समरसता बढ़ेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा।

(नोट - प्रस्तुत आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, इसका द फॉलोअप से कोई लेना-देना नहीं है)


 

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