पूर्वी सिंहभूम:
अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिल दूर नहीं रहती। अभावों की लंबी छाया और संघर्ष से भरे बचपन के बीच गीता गोराई ने जैक मैट्रिक बोर्ड की परीक्षा में 97.2 प्रतिशत अंक हासिल कर पूर्वी सिंहभूम जिले में तीसरा स्थान प्राप्त किया है। यह उपलब्धि केवल एक छात्रा की सफलता नहीं, बल्कि उस जिद और जज्बे की कहानी है, जो हर कठिन परिस्थिति को पीछे छोड़ देती है। जमशेदपुर के सोनारी राम नगर स्थित भारत सेवा श्रम संघ प्राणवानंद विद्या मंदिर हाई स्कूल से गीता गोराई ने जैक बोर्ड की परीक्षा दी। आज जारी परिणाम में उसे कुल 486 अंक प्राप्त हुए।

मसाला गोदाम में मजदूरी करते हैं पिता
गीता के पिता अजीत गोराई पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में एक मसाला गोदाम में पैकिंग का काम करते हैं, जिससे परिवार की आमदनी बेहद सीमित है। वहीं, मां खोमा गोराई सिलाई-बुनाई कर घर संभालती हैं। आर्थिक तंगी के कारण माता-पिता बेटी की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने में असमर्थ रहे। ऐसे में गीता ने जमशेदपुर के सोनारी स्थित अपनी नानी कमला गोराई के घर रहकर पढ़ाई जारी रखी।
बचपन से ही गीता को नानी ने संभाला
बचपन से ही नानी कमला गोराई ने उसे संभाला। लेकिन यहां भी हालात आसान नहीं थे। नाना के निधन के बाद घर में कोई स्थायी कमाने वाला नहीं है। इसके बावजूद नानी ने हार नहीं मानी। शादी-पार्टी में कारीगरों को बर्तन भाड़े पर देकर जो भी थोड़ी-बहुत आमदनी होती, उसी से पोती की पढ़ाई का खर्च उठाया गया।
गीता की दिनचर्या बेहद अनुशासित थी
2 कमरों के अल्बेस्टर्स के छोटे से मकान में जरूरत भर का सामान भी नहीं है, लेकिन गीता का हौसला हमेशा बड़ा रहा। पढ़ाई के साथ-साथ वह नृत्य, संगीत, चित्रकला और खेलकूद में भी अव्वल रही है। स्कूल में मेडल जीतना उसके लिए आम बात रही है। उसकी दिनचर्या भी उतनी ही अनुशासित रही। सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई, फिर स्कूल और ट्यूशन के बाद घर के काम में हाथ बंटाना।
इंजीनियरिंग करना चाहती है गीता गोराई
सीमित साधनों में पली-बढ़ी गीता ने अपनी मेहनत और अनुशासन से यह साबित कर दिया कि हालात चाहे जैसे भी हों, संघर्ष कभी हुनरमंद के इरादों में बाधा नहीं बन सकता। गीता अब आगे प्लस टू में प्योर साइंस लेकर पढ़ाई करना चाहती है और इसके बाद इंजीनियरिंग करना उसका सपना है। हालांकि आर्थिक स्थिति उसके सामने बड़ी चुनौती बनी हुई है।
गीता ने सरकार से सहायता की अपील की
गीता ने सरकार से सहायता की अपील करते हुए कहा कि अगर उसे सहयोग मिला, तो वह अपने सपनों को जरूर साकार करेगी और झारखंड के साथ देश का नाम भी रोशन करेगी। गीता की यह कहानी न सिर्फ प्रेरणा है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या प्रतिभा को आगे बढ़ने के लिए अब भी संसाधनों की लड़ाई लड़नी पड़ेगी।