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इतने विरोध और शोर-शराबे के बावजूद बेफिक्र क्यों है भाजपा, जानिये क्या है मिशन 2024 की तैयारी

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द फॉलोअप टीम, दिल्‍ली:
केंद्र की मोदी सरकार के विरुद्ध कहीं मुखर, तो कहीं ढंके-छुपे विरोध जारी है। नोटबंदी के बाद से आरंभ विरोध कोराना काल से होता महंगाई और जासूसी कांड तक शिखर पर पहुंच गया है। लेकिन भाजपा या सरकार वो इनसब से लापरवाह दिखलाई देती है। उसका हिंदुत्वक का एजेंडा बदस्तूकर जारी है ही, साथ ही उसने नई बहुजन पॉलिटिक्स करने की कोशिश की है। हालांकि इसकी शुरुआत भाजपा ने बहुत पहले से कर दी थी। एक (दलित) राष्ट्रपति और (ओबीसी) प्रधानमंत्री पहले से ही हैं। जानिये मिशन 2024 की भाजपा की तैयारी क्या है।

 

मोदी के नए मंत्रिमंडल मे दलित और ओबीसी
मोदी मंत्रिमंडल का जब विस्तार हुआ तो इसमें दलित और ओबीसी को प्रमुखता से शामिल किया गया है। बताया जाता है कि नई कैबिनेट में 27 ओबीसी और 20 एससी-एसटी समुदाय से मंत्री बनाए गए हैं। इनमें पंकज चौधरी, अनुप्रिया पटेल, एसपी बघेल, भानु प्रताप वर्मा,  कौशल किशोर और बीएल वर्मा आदि शामिल है। इनमें 6 ओबीसी और दलित समाज से हैं। ओबीसी कुर्मी समाज से पंकज चौधरी और अनुप्रिया पटेल हैं। पासी समाज से कौशल किशोर हैं। लोध (पिछड़ी जाति) समाज से बीएल वर्मा आते हैं।

क्यों आया बदलाव
जनसंघ से भाजपा तक के सफर में इस दल को अटल बिहारी वाजपेयी युग तक सवर्ण वर्ग के कुछ वोट के साथ शहरी वोट मिलते रहे हैं। 2004 तक भाजपा को  कुल 28 प्रतिशत अधिकतम वोट मिला है। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत अचानक 31 तक जा पहुंचा। हालांकि इसके कारण मनमोहन सरकार से नाराजगी भी बताई गई है। वहीं विकास का नारा भी अन्य सबब रहा। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव तक वोट 37 प्रतिशत पहुंच गया है।


 

अब समझिये जातीय गणित
भारत में लगभग 45 से 48 प्रतिशत वोट ओबीसी के हैं। 2014 और 2019 के चुनाव में भाजपा को बड़ी संख्या में ओबीसी और दलितों ने भी वोट दिए। साल 2009 से पहले तक भाजपा को 20-22 प्रतिशत ही ओबीसी वोट करते थे। लेकिन यही आंकड़ा 2014 में 33-34 तो 2019 लोकसभा चुनाव में 44 प्रतिशत तक पहुंच गया। साल 2009 से पहले तक भाजपा के पास दलित वोट 10-12 प्रतिशत थे। 2014 में यह 24 प्रतिशत और 2019 में 34 प्रतिशततक जा पहुंचा।

बढ़ते वोट प्रतिशत ने  दिया हौसला
जब भाजपा ने देख लिया कि वो हिंदुत्व  के नाम पर दलित और ओबीसी वोटर को लुभाने में कामयाब हो रही है, तो क्यों न मंत्रिमंडल में भी उस वर्ग को यथोचित जगह दी जाए। इसे ही तो नई बहुजन पॉलिटिक्स कहते हैं। सवर्ण वोटर तो अब भाजपा के परंपरागत हो चुके ही हैं। दलित, आदिवासी और ओबीसी को साधने की कवायद है। यही 2024 में इन्हें  सफलता देंंंगे। राजनीतिक पंडित कहते हैं कि भाजपा ने बस ओबीसी से यादव समाज और दलित वर्ग से जाटव को जोड़ने का वैसा प्रयास इसलिए नहीं किया है कि वो परंपरागत रूप से राजद, सपा और बसपा के वोटर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। इन वर्ग से भी भाजपा के नेता हैं। वो थोड़ा बहुत अपना असर तो रखते ही होंगे।