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स्वरा भास्कर मुझे तुमसे इश्क हो गया है..तापसी ने छुआ है मेरे मन को.....

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सतीश छिम्पा
तापसी पन्नू और स्वरा भास्कर इसलिए जरूरी नहींं हो जाती कि वे दोनों निडरता से सच को खुलकर बोलती हैंं बल्कि वे दोनों जरूरी हो जाती हैंं क्योंकि उनको पता है बहुत अच्छे से कि उनकी इस निडर और ईमानदार पक्षधरता के कारण से उनका कॅरियर भी सिंघम के 'जयकांत शिकरे' उर्फ़ 'प्रकाश राज' की तरह वॉलीवुड में चौपट कर दिया जाएगा। लेकिन इन सब स्थितियों को जानते हुए भी उनका लगातार अपना पक्ष मज़बूती से रखना बहुत बड़ी स्थापनाएं करता है। सचिन तेंदुलकर हो या विराट कोहली या अक्षय कुमार या अनुपम खेर या बड़बोली कंगना राणावत या गीता या बबीता फोगाट- ये सब के सब इस पूंजीवादी अपसांस्कृतिक अवमूल्यों के समय के जीवाणुओं से संकृमित धनपति हैंं जिन्हें अपनी पीढ़ियों के लिए धन संचय करना है। भारत मे खेल (ख़ासकर क्रिकेट) और सिनेमा 'पूंजीवाद के सबसे अश्लील और सड़ांध मार रहे पक्ष' का वीभत्स रूप है। उनकी प्रसिद्धि में भले ही सबसे बड़ा हाथ यहां की मेहनतकश जनता का रहा हो मगर यह जानते हुए भी वे इस तरफ़ से बेफिक्र होकर 'जनद्रोही ताकतों के पक्ष' में निरंतर बोलते रहते हैं। 

अभी हाल ही में मोजूदा किसान आंदोलन के समर्थन में सिंघु बॉर्डर पर पहुंची स्वरा भास्कर ने कहा कि-'मैं किसान नहीं लेकिन रोटी से नाता है।'' स्वरा भास्कर अपने बेबाकी भरे अंदाज के लिए जानी जाती हैं। वे देश के मुद्दों पर बिना किसी भय के अपनी राय रखती हैं। इन दिनों देश में जो गर्म मुद्दा कृषि कानूनो के खिलाफ किसानों का विरोध प्रदर्शन बन गया है को लेकर स्वरा शुरू से ही सक्रिय हैं। वे किसान प्रोटेस्ट में शामिल होने सिंघु बॉर्डर पर भी पहुंची थी। स्वरा  ने अपने ट्‌वीट में लिखा था कि- 'प्रदर्शनकारी किसानों और बुजुर्गों की धैर्य, संकल्प और दृढ़ संकल्प देखने के लिए सिंघू बॉर्डर पर। एक विनम्र दिन।' स्वरा ने यह भी कहा कि- ''मैं किसी को यहां समर्थन देने आई हूं, बल्कि मैं यहां किसानों से कुछ सीखने आई हूं। मैं किसान नहीं हूं, लेकिन मेरा रोटी से नाता है, इसलिए मेरा किसानों से भी नाता है। मुझे बहुत शर्म आ रही है कि हम एक ऐसा समाज है, जहा कड़कती ठंड मे बुजुर्ग सड़कों पर सो रहे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि ये किस तरह का क्राइसिस है। क्या इसे पहले नहीं सुलझाया जा सकता था ?"

अगर आप बड़बोली कंगना राणावत के किसी भी 'ट्वीट' को गंभीरता से लेते हैं तो आपको अपनी 'गंभीरता' पर दुबारा सोचना चाहिए कि कहीं वो 'समकालीन सोशल मीडिया की नकली गंभीरता' तो नहीं है। और साथ ही इस बड़बोली से स्वरा भास्कर या तापसी पन्नू से तुलना करना इनके किरदार का अपमान है। निडर, निसंकोच और प्रतिबद्ध अदाकारा स्वरा फासिज़्म के विरुध खुलकर बोलने वाली एक जीवित अभिनेत्री है। तो वहीं तापसी जो अक्सर कम बोलती है- इस बार अपनी बात बहुत ठोस तरीके से रख पाई है। इन दोनों अभिनेत्रियों की जिंदा बातें और प्रतिरोध के कारण इनके किरदार से इश्क होना लाज़िम है।



इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप रंगकर्मी हैं या पेशेवर कलाकार है और आपका निजी जीवन उदास है या रंगीनियों से भरा हुआ है। आप सिंगल है या मिंगल है या आपके कई कई प्रेम संबंध है- यह आपका निजी मसला है। अगर आप सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक मुद्दों के बारे में बात करते हुए 'आई हैट पॉलिटिक्स' बोलते हैं तो बहुत फ़र्क पड़ता है। तब आप एक बहुत शातिर और घाघ व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं। क्योंकि हर एक रंगकर्मी या रचनाकार का हर एक उस मुद्दे से संबंध है जो मनुष्य और मनुष्य जीवन को प्रभावित करता है। हाँ, यह जरूर है कि इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि आप बहुत अच्छे कलाकार हैं या औसत हैं या बुरे हैं- यह तो आलोचना का विषय है जो सतत प्रयास से निखरता जाएगा। आप कलाकार है और अपने अभिनय में लोक/ जनता की बात करते हैं तो यह आपकी जिम्मेदारी बन जाती है कि आप उस पर सार्वजनिक रूप से भी बात करें। उनके छीने जा रहे अधिकार और हो रहे दमन पर- उनके पक्ष में आते हुए सकारात्मक बात करें या कम से कम उस तरह तो करनी ही चाहिए- जिस तरह से आप उस भूमिका का निर्वहन करते हैं।

आप अगर किसी संस्थान के लिए खेलने वाले खिलाड़ी है या  फ़िल्म अभिनेता है या 'फिल्मी पर्दे पर कमर हिलाने या ढिशुम ढिशुम में आपकी हर एक 'क्रिया' - निर्माता के हाथ मे लहरा रहे चेक में दी गई 'संख्या' पर निर्भर करते हुए अपना स्तर तय करते हैं। आपके बयान भले ही 'आपकी ऑस्कर' की चाहत से प्रभावित रहते हों। और लोग आपको अज्ञानतावश 'देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ी' या 'देश के लिए फ़िल्म बनाने वाला देशभक्त अभिनेता/अभिनेत्री'- के रूप में देखते हुए आपके अवदान के बदले आपको भगवान कहते हैं तो यकीन मानिए कि वे पूरी निष्कपटता से आपको आराध्य मानते हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप खेलते समय पूरी तरह से अपने 'पारिश्रमिक' को ध्यान में रखकर संस्थान की आर्थिक छवि को बरकरार रखने के लिए पसीना बहाते हैं। या आपके 'ठुमके' या 'एक्शन' चेक की डिजिट पर निर्भर करते है- उन्हें इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप इस गरीब देश के असंख्य गरीबों, वंचितों, शोषितों और बेघरों, बेरोजगारों की उम्मीदों को चिकन की बोटी की तरह चबाकर अपने बैंक बैलेंस को बढ़ा रहे हैं। 

यह बात हमेशा याद रहनी चाहिए कि आप अपनी कला के बूते जरूर स्थापित हैं मगर उस स्थापना में हाथ इस देश की मेहनतकश जनता का है। आपको जो भी सम्मान मिला है वह बुर्जुआजी या राजसत्ता से नहीं मिला है बल्कि उस भारी भीड़  से मिला है जिसको तुम लोग 'पिछलग्गू' भीड़ के रूप में देखते हो। इस मामले में मैं आपसे ज्यादा बेहतर और महान मानता हूँ बांग्लादेशी क्रिकेटर मुशर्रफ़ मुर्तजा को और हॉलीवुड के अभिनेता 'लिओनार्दो डिकैप्रियो' और 'नताली पोर्टमैन' को जिसने इजराइली 'यहूदी' होते हुए भी फिलिस्तीनी संघर्ष के पक्ष में बहुत मज़बूती से अपनी बात रखी। और वॉलीवुड की 'स्वरा भास्कर' और अपने बूते, अपने अभिनय के दम पर सफल होकर स्थापित हुई 'तापसी पन्नू' और नसीरुद्दीन शाह के बारे में तो आप जानते ही हैं।



 एक बार किसी मैच के बाद प्रेस से मुख़ातिब होते हुए बांग्लादेश के लोकप्रिय क्रिकेटर मशरफ़ मुर्तज़ा ने एक बहुत अच्छी बात कही थी कि- "हां, में क्रिकेट खेलता हूँ। लेकिन क्या मैं किसी की जान बचा सकता हूँ ? क्या गेंहूं का एक दाना उगा सकता हूं ? क्या एक ईंट जोड़ सकता हूँ ? हीरो बनाना है तो डॉक्टर को , किसान को , मज़दूर को बनाइए। मैं काहे का हीरो हूँ ? मैं आपका मनोरंजन करने के पैसे लेता हूँ। आपका चहेता परफॉर्मर हूँ, जैसे फिल्मी सितारे होते हैं। मुक्ति योद्धाओं ने गोलियों का सामना पैसे के लिए नहीं किया। वे हीरो थे ,परफॉर्मर नहीं। हीरो क्रिकेटर रकीबुल हसन था जो मुक्तियुद्ध के पहले ही अपने बल्ले पर जय बांग्ला लिख कर मैदान पर उतरा था। वे कौन अहमक हैं जो देशभक्ति को क्रिकेट से जोड़कर खेल बना रहे हैं। वे ख़तरनाक खिलाड़ी हैं। वे सच्चे देशभक्तों की बेइज़्ज़ती करते हैं।"

स्वरा भास्कर के पास चेतना है। चेतन्य विचार। फासिस्ट दौर में उसने हमेशा शोषण तंत्र के सबसे निर्मम भाग, मतलब नेतृत्व, सरकार ही नही बल्कि व्यवस्था पर भी प्रश्न उठाए। और वो लगातार इन ज्वलंत राजनीतिक- सामाजिक मुद्दों को लेकर  मुखर रही हैं। सीए.ए. और जेएनयू में हुई हिंसा को लेकर स्वरा भास्कर लगातार अपना विरोध जता रही थी, जिस वजह से वह बहुतों के निशाने पर भी हैं। ऐसे फासिस्ट अंधड़ में उम्र की लिहाज शर्म भूलकर  राज शांडिल्य ने भी अपने ट्विट में स्वरा के खिलाफ अभद्र शब्द का इस्तेमाल किया, जिसके बाद स्वरा ने भाषा की गरिमा कायम रखते हुए उन्हें करारा जवाब दिया है। राज शांडिल्य ने ट्विट में लिखा- "सस्ती चीजों पर ध्यान न दें...स्वरा भास्कर से महंगा दैनिक भास्कर बिकता है।" शायद उन्हें भी अपनी भाषा आपत्तिजनक लगी होगी, क्योंकि निर्देशक ने तुरंत ही ट्विट को डिलीट कर दिया। स्वरा भास्कर ने भी उनके ट्विट पर करारा जवाब देते हुए लिखा- अगली बार रोल ऑफर करने और आपकी फिल्म के ट्रेलर को शेयर करने की रिक्वेस्ट वाले मैसेज भेजने से पहले आप भी सस्ती हरकतों के बारे में थोड़ा सोच लेना। बहुत प्यारी और यूनिक अभिनेत्री हैं।

स्वरा भास्कर क्यों इतनी बेहतरीन और संजीदा ऐक्ट्रेस है, क्यों वो चीजो को बारीकी से पकड़ती है ? संवेदना की गहन गूंझळ को कैसे छू लेती है। फासिस्ट लंपट गुंडावहिनियो के हमलों, कुत्सा प्रचार के विरुद्ध आज अचानक एक वीडियो सामने आया जिसमे वो होस्ट को अपना घर दिखा रही है और अचानक वे स्वरा की लाइब्रेरी के पास पहुँच जाते हैं। होस्ट बोलती है कि इसमें से आपकी पसंदीदा किताब निकालो तो स्वरा भास्कर अवतार सिंह पाश की सम्पूर्ण कविताएं निकालती है जो हिंदी में आधार प्रकाशन ने छापी है और कहती हैं कि " पाश मेरे प्रिय कवि हैं , अब मैं विदा लेता हूँ, लोहा, सबसे खतरनाक'- प्रिय कविताएं हैं", वहीं जब होस्ट स्वरा के घर में घुसती है तो एक कविता पोस्टर दिवार पर लटका दिखता है, केदारनाथ जी की 'मई दिवस' कविता का जो सम्भवतः पंकज दीक्षित सर का बनाया है। मई दिवस कविता को सम्हालना तो दूर की बात है बॉलीवुड के हीरो हिरोइन इस की संवेदना के नज़दीक ही नहीं फटक सकते।
 
बहुत से अभिनेता अभिनेत्रियों में किताबो के लिए रूचि है, मगर नन्दिता दास या स्वरा भास्कर की प्रतिबद्ध भूमिका सबसे अलग और आद्भूत है। रंगमंच और सिनेमा की इस पीढ़ी में स्वरा जैसे इक्का दुक्का ही कलाकार है जो जिंदा सोच रखते हैं। नसीरुद्दीन शाह एक साक्षात्कार में कहते हैं कि " रंगमंचीय कलाकार को लोक के जिस सबसे गहरे अनुभवों के बीच उतरना होता है वहां उसके विज़न की भी परख होती है जो विस्तृत नही होगा कभी भी बिना किताबों के....." और मोजूदा किसान आंदोलन पर भी उन्होंने बहुत गंभीरता से कहा है कि 'आपका चुप रहना आपको अत्याचारी के पक्ष में खड़ा करता है।'

तो वहीं बेहतरीन अभिनेत्री तापसी पन्नू ने 'रेहाना और मिया ख़लीफ़ा' के ट्वीट्स पर आने वाली प्रतिक्रिया स्वरूप नकारात्मक ट्वीट्स की झड़ी में इस किसान आंदोलन को देखते हुए बहुत स्तरीय और गरिमामयी भाषा मे ठोस ट्वीट किया था। अपने ट्वीट में तापसी
लिखतीं हैं कि - 'अगर एक ट्वीट से आपकी एकता हिल जाती है। अगर एक चुटकुले से आपकी आस्था हिल जाती है। या एक शो से आपके धार्मिक विश्वास हिल जाते हैं तो आपको अपनी मूल्य चेतना को मज़बूत करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि दूसरों के लिए 'प्रोपेगैंडा टीचर' न बनें।'- उक्त ट्वीट में तापसी की प्रतिबद्धता और पक्षधरता साफ़ उभरकर सामने आती हैं। वैसे यह पहला मामला नहीं है जिसमे उन्होंने ट्वीट करके हस्तक्षेप किया हो- वे अक्सर सार्वजनिक, सामाजिक और राजनीतिक मसलों में निरंतर हस्तक्षेप करती रही हैं। और यही कारण है कि वे जीवित लोगों की श्रेणी में आती हैं।



(मूलत: पंजाब के रहनेवाले सतीश छिम्पा सरोकारी पत्रकार हैं। कविताई भी करते हैं।)


नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। असहमति के विवेक का भी हम सम्‍मान करते हैं।