जॉन अब्दुल्लाह
'कर्नल गद्दाफ़ी' के नाम से मशहूर रहे मुअम्मर अल-गद्दाफ़ी (7 जून 1942-20 अक्टूबर 2011) ने लिबिया पर 42 साल तक राज किया। दुनिया ने उन्हें तानाशाह के रूप में जाना। एक खूँखार शासक, तानाशाह, अय्याश और आतंकवादी। गद्दाफी का नाम सुनते सामान्य मस्तिष्क में सबसे पहले यही शब्द तो गूंजते हैं। जबकि दूसरे विश्व युद्ध से अब तक अमेरिका के हाथों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करोड़ लोगों कीजान जा चुकी है। बावजूद इसके, अमेरिका दुनिया की नज़र में अब भी शांतिदूत है। गद्दाफी का काल 2011 में नाटो फ़ौज के लीबिया में दाखिले के साथ ख़त्म कर दिया गया था। कथित रेबेल्स ने गद्दाफी को सड़क पर लाकर एक दर्दनाक मौत दी। लेकिन शायद आपकी बात से एक लीबिया का आम नागरिक असहमति दर्ज करा दे। लेकिन अपने राज्य लीबिया के लिए उसने किया ऐसा। अफ्रीका को एक और मज़बूत महाद्वीप बनाने के लिए उसने बहुत कोशिश की जो मेन स्ट्रीम मीडिया द्वारा आपको नहीं बताई जाती। एक तानाशाह आखिर इतने सालों तक जनता पर क्यों राज कर सका। जानते हैं, उस दौर की ऐसी ही अहम बातें।
घर को मानव अधिकार में शामिल करना
गद्दाफी के काल में लीबिया में हर लीबियाई के पास अपना घर हो, इसकी वकालत गद्दाफी मानव अधिकार के तौर पर करता था। अपनी किताब "the green book" में उसने लिखा :" घर, एक एकल या परिवार की प्रार्थमिक ज़रुरत है, जिसका स्वामित्व किसी अन्य के हाथ में न हो।" गद्दाफ़ी की यह ग्रीन बुक लीडर के राजनीतिक फलसफे की किताब थी, जो 1975 में सभी लिबियन्स द्वारा पढ़े जाने की आशा में छपी थी।

मुफ़्त शिक्षा और मेडिकल सुविधा
गद्दाफी ने जब सत्ता संभाली थी तब लीबिया की शिक्षा दर 25 % थी। लेकिन जब गद्दाफी को 2011 में शहीद किया गया तब यह दर 87 फीसद की थी। जिसमें 25 फीसद विश्विद्यालय उत्तीर्ण थे।गद्दाफी के काल में स्वस्थ सुविधाएं सम्पूर्ण अरब और अफ्रीका में उच्च श्रेणी में से थी। यदि कोई लीबिया नागरिक पढ़ाई करना चाहता था, परंतु धन का अभाव होता तो सरकार उसकी पढ़ाई यहाँ तक की विदेश में पढ़ाई का भी पूरा ख्याल रखती थी।
दुनिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित सिंचाई प्रोजेक्ट
अगर कोई लीबिया नागरिक कृषि व्यवसाय शुरू करना चाहता तो सरकार की तरफ से उसे मुफ़्त में ज़मीन, खेती उपकरण, बीज और पशु दिए जाते थे। गद्दाफी के शासन में दुनिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित सिंचाई प्रोजेक्ट बना, इसमें बहुत सारी मानव निर्मित नदिया बनाई गयी ताकि पूरे लीबिया में पानी का संकट ख़त्म हो जाए, लीबिया सरकार इसे आठवाँ अजूबा कहती थी।

नवजात शिशुओ की माँ को भत्ता
जब कोई लीबिया महिला माँ बनती तब सरकार की तरफ से 5000 अमेरिकी डॉलर यानी लगभग भारत के तीन लाख 25 हज़ार रुपए दिए जाते। लीबिया में बिजलो 100 फीसद सब्सिडाइज़्ड थी यानी बिजली का कोई बिल किसी लिबियन को भरना नहीं पड़ता था। गद्दाफी के शासन काल में पेट्रोल सस्ता था। तब लीबिया में पेट्रोल का दाम 0.14 डॉलर यानी 11 भारतीय रुपए के आस पास था।
दुनिया का पहला ऋण मुक्त देश, गोल्ड दीनार
लीबिया दुनिया का पहला ऋण मुक्त देश था यानी लीबिया पर किसी भी बाहरी देश या संगठन का कोई कर्ज़ा नहीं था। लीबिया के पास अपने स्टेट बैंक जो 0 % इंट्रेस्ट रेट पर लिबियन्स को ऋण देता था। गद्दाफी पूरी तरह से डॉलर में ट्रेड करने के खिलाफ जाकर पैन-अफ्रीका लेवल पर एक करेंसी लाना चाहता था जो सोने के दीनार के रूप में थी। साथ ही वो यूनाइटेड स्टेट और अफ्रीका बनाना चाहता था। विशेषज्ञ मानते हैं कि उसकी यही नीति अमेरिका और उसके सहयोगियों को पसंद नहीं आई। क्योकि डॉलर के इनकार और खुद का सोना लाने का मतलब रियल वेल्थ को कागज़ की रसीदों पर तरजीह देना था, जिसके माध्यम से अमेरिका और उसके सहयोगी दूसरे देशों को कर्ज़ा देकर अपना प्रभुत्व स्थापित करते थे।
(मूलत: उत्तरप्रदेश के बहराइच के रहने वाले लेखक बरसों तक अरब देशों में रह चुके हैं। संप्रति स्वतंत्र लेखन। )
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। सहमति के विवेक के साथ असहमति के साहस का भी हम सम्मान करते हैं।