आभा बोधिसत्व, मुंबई:
विचित्र दौर से गुज़र रहा है देश। और देश की राजनीति भी। हर तरफ़ चौंकाने वाले दृश्य बिल्कुल स्पष्ट हैं। जिसके इतिहास की गवाह आज की हर तबके की जनता है और होगी। जिसमें एक तरफ़ सेंट्रल विस्टा का बनना-रहते जाना और दूसरी तरफ़ भयंकर महामारी द्वारा हर वर्ग-उम्र की जनता का मरते जाना और लगातार मरते जाने की ख़बरों ने रातों की नींद हराम होना। कई कई रात करवट बदलते हमारे आप की ही तरह लाखों, करोड़ों ने भी बिताई होगी। जिस तरह गंगा लाशों से पट गईं। जिस तरह श्मशान
घाट चिताओं की लपट से धूधूआती रही। दिन-दिन। जिस तरह हर दिन हजारों कब्रों मे दफ्न हुए जनाजे का यह विश्वास ज़्यादा सर चढ़ने लगा- कल हमारी बारी,परसों इसकी उसकी बारी! यह भी लगने लगा कि संभवतः यह भी हो सकता है - भारत एक बहुसंख्या वाले देश से अल्प-जनसख्या वाला देश न हो जाए। इतना सब कुछ दो से आज ढाई महीने-अप्रैल से जून चलता रहा और जनता के जान बचाने की तैयारी, उपाय करने के बदले,सरकार इस ओर से विमुख रही। बल्कि मतलब साधती रहीं और मजबूर ग़रीब जनता को पैसे बांट कर प्रचारक की भीड़ जुटाती रही। यानी जनता मरे या जीए,'सरकार साहब' को अपनी वोट की राजनीति में लगे रहना है।
रसूख दारों को भी तिल-तिल मरते देखा-पढ़ा-सुना सबने
बांटो और राज करो का नंगा नाच हम सबने-सभी वर्ग और सभी उम्र की जनता ने कोरोना काल में साफ देखा। जिस जनता को बरगला कर वोट लिया, उसी जनता के मरते जाने पर कान पर जूं तक नहीं रेंगी। कमाल का देश और कमाल की सरकार! और तो और रसूख दारों को भी तिल-तिल मरते देखा-पढ़ा-सुना सबने। विदेशों में भी जनता और उनकी सरकारों की आंखे नम हुई। उन विदेशी सरकारों ने हमें सहायता पहुंचाई- यूएसए आस्ट्रेलिया,चीन,जर्मनी सउदी अरब फ्रास, पाकिस्तान, सिंगापुर,यूटिटेड किंगडम ने मनुष्यता का पैगाम इस तरह से भेजा। लेकिन हमारी सरकार ने खुद को ईश्वर समझ लिया और अपनी वोट की राजनीति के साथ सेंट्रल विस्टा में मजदूरों की जान को जोखिम में डालकर अपने स्वार्थ में लगे रहे।लगे हैं जनता की ही तरफ़ से सवाल है कि क्या यह कृत्य न्याय संगत या तर्क संगत है? मरता क्या न करता की तरह। मच्छरों,चूहों की मौत जनता मरती रही और अब भी मर रही है। वोट देने वाली जनता के जान की कीमत ही नहीं।
पहली कोराना लहर में पैदल मीलों चलकर घर लौटे मजदूर
इस बीच विपक्ष ने कम-से-कम मानवता को आधार बना कर हर संभव जनता की मददगार बनी रही। और इस ओर भी ध्यान गया कि विपक्ष ने पहली लहर में भी अपनी हर संभव मदद की कोशिश की। जिसमें यूपी सरकार ने अड़ंगा डाल कर मरती -भागती जनता को मरने दिया। पैदल चल चल कर,और बसों को यह कह कर रोक दिया कि दूसरे प्रदेशों की बसें यूपी नहीं जा सकती।यह तो जनता द्वारा दी गई सरकार नहीं ये तो जनता के ईश्वर अल्लाह नामक मालिक बन बैठे कि दूसरे प्रदेशों में खाने- कमाने के हो तो अब उसकी सजा भी भुगतो। इस सबके बीच जो सबसे दुखद बात पढ़ने -सुनने- जानने को मिली वह दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सेट्रल विस्टा को बनने देने को कोई अवरोध कार्य ही नहीं माना।इस ख़बर को पढ़ कर मन सुन्न पड़ गया और हम पीछे की राजनीति यानी इतिहास के पन्नों पर नजरें दौड़ाने लगे। रातों की नींद हराम कर इतिहास के पन्ने आंखों के सामने नाचने लगे इस तरह कि इतिहास दोहराया जा रहा है।
क्यों याद आने लगा 1857 का विद्रोह
2020-2021 का लोकतंत्र मानो 1857 का युद्ध हो। मानो हम गुलाम हों। मानो अंग्रेजी राज है जो जनता को आपस में भिड़ा कर अपना उल्लू सीधा करती रही। ऐसे में कंपनी सरकार का विरोध भला 'कानून' कैसे कर सकता है। यह समय कंपनी राज का है मानों अब क्या होगा। होगा क्या? उस जनता का जिसने अपने मूर्खता का परिणाम खुद ही देख लिया कि उनके अपने, उनके करीबी, मित्र, बच्चे मरते रहे और इस सरकार ने कुछ भी नहीं किया। याद करें तो 2019 चुनाव के नतीजे भी चौंकाने वाले थे। सरकार और कानून का खेल जनता हर हाल,हर मुद्दों में समझ और देख चुकी है। यह भी देख चुकी कि विपक्ष प्रोपगैंडा नहीं करती बल्कि वक्त पर जनता के काम आती है। जनता को और चाहिए ही क्या! यह अलग बात है कि इसी बीजेपी की सरकार ने आज विपक्ष में बैठी सरकार को लूट खसोट वाली सरकार कह कर, सात साल पहले गद्दी पर काबिज हुईं, इसलिए कि जनता बेईमान सरकार नहीं चाहती। बदले में मिला क्या? बस जनता का खून चूस कर उसे उसके हाल पर छोड़ देना।जनता की लगातार होती मौत पर मौन होकर, अपने स्वार्थ में लिप्त रही सरकार सबको दिख रही है!साथ ही यह बता रही हैं कि बेगैरत जनता हम तुम्हें तुम्हारी औकात बताते हैं।
कांग्रेस में पुराने कद्दावर नेताओं की कोई पूछ ही नहीं
अब जनता यदि मूर्ख नहीं है तो उसे बताना होगा कि बेगैरत है कौन आखिर! 'माफी सहित' यह भी कि जनता को काना राजा चाहिए। इतना चतुर नहीं कि मतलब निकल जाने के बाद जनता को पहचाने ही नहीं! कुल मिलाकर कर दूर तक सोचने पर यह भी लगता है कि यह सरकार देश की दुश्मन है और इसकी डोर किसी और आकाश किसी और हाथ के साथ हैं! उससे भी बड़ी उलझन विपक्ष में बैठी कांग्रेस से है जो अपने अहम में डूबी है और चुप है। राहुल, प्रियंका अपने अपने स्तर पर जनता का सहयोग कर देते हैं या करवा देते हैं। उसके बाद सोनिया गांधी को लगता है बस हो गई विपक्ष की कोरम पूर्ति। इसी कांग्रेस में पुराने कद्दावर नेताओं की कोई पूछ ही नहीं? यह कैसी विपक्ष है? ऐसे में राजनीति में अपना जीवन खपा देने वाले नेता जब खुद को उपेक्षित महसूस करेंगे तब या तो राजनीति छोड़ेंगे या चुपचाप अपना काम करेंगे। जो कि हुआ। होता दिख रहा है।साथ ही परले दर्जे के स्वार्थी तो हमेशा दल बदल में ही विश्वास रखते हैं, उनका तो काम ही है इधर से उधर या उधर से इधर।खैर यदि कांग्रेस आलाकमान को देश की सचमुच चिंता है तो उन्हें चाहिए की अपनी पार्टी के सभी नेताओं को बुला कर मिटिंग करें। सबको महत्व दें।
जनता को अब और मूर्ख नहीं बनाया जा सकता
फिलहाल जो स्थिति है, ऐसे कांग्रेस पार्टी को गांधी परिवार की 'पारिवारिक पार्टी' समझ कर जनता को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। चुप रहने और पार्टी को अपना 'घर' समझने की सजा जनता भूगत रही है। ऐसा नहीं होना चाहिए! विपक्ष को मौन रहने और जनता को थोड़ी सहायता पहुचा कर भावुक करने के बदले सरकार से ज्यादा बुरी सजा न मिले विपक्ष को कि यह परिवार ही इस पार्टी की गर्त की वजह बने!कहते हैं कि परिवार हो या देश समय रहते कमान संभालने वाला नहीं सुधरा तो सब कुछ गर्त में जाना तय है। दो अक्षर पढ़ चुकी जनता के लिए राजनीति का इतिहास साक्षी है लेकिन इस समय तो जनता ही साक्षी है कि सरकार और विपक्ष किस किस अलग अलग विधिः से जनता को बरगलाने में लगी है। देश की शान को बट्टा लगा लगा कर सरकार बार बार खुद की पीठ ठोक लेती है और बिकी हुई मीडिया उसे ख़बर बना कर परसों देती है! जैसा कि अभी कल ही पढ़ा कि सरकार के पास इस समय विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा भंडार है। शर्म के बदले वाहवाही हद् है। महामारी के नाम पर और मनुष्यता के नाम पर आया चंदा इक्कठा कर हमारी सरकार उस पर भी वाह-वाही लूटने से बाज़ नहीं आती। क्या ही कहें बस अब बस ही करते हैं। लाशों की ढेर याद कर करके कितनी रातों की नींद हराम कर सकती है जनता और कितनी कितनी-सरकार की बेशर्मी झेल सकती है जनता!विपक्ष तो मनुष्यता दिखा कर अपने अहमकाना अदा में लौट जाती है बार बार लेकिन सरकार तो जनता की ही बैरी बन, मानो अब आबादी कम कर देने पर तुली हो!

(लेखिका का जन्म बंगाल में हुआ। पढ़ाई-लिखाई उत्तर प्रदेश में। इलाहाबाद विवि से हिंदी में एमए। 30 सालों से हर विधा में लेखन। सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। किताब भी छपी। रेडियो और टीवी धारावाहिकों के लिए भी लिखा। कुछ दिनों सेंट जेवियर्स स्कूल, मुंबई में पढ़ाया भी। फिल्म पोस्टाग्रेजुएट का संवाद लेखन। संप्रति मुबई में रहकर स्वतंत्र लेखन।)
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