द फॉलोअप डेस्क
भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीन के क़्विंगदाओ में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की दो दिवसीय रक्षा मंत्रियों की बैठक में प्रस्तावित साझा बयान (ज्वाइंट स्टेटमेंट) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। भारत की ओर से इसका कारण यह बताया गया कि साझा बयान में आतंकवाद को लेकर भारत की चिंताओं को शामिल नहीं किया गया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि एससीओ के कुछ सदस्य देशों के बीच कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी, जिसके कारण ज्वाइंट स्टेटमेंट को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। उन्होंने कहा कि भारत चाहता था कि आतंकवाद से जुड़ी उसकी गंभीर चिंताएं उस दस्तावेज में दर्ज की जाएं, लेकिन एक देश ने उस पर आपत्ति जताई, जिस कारण भारत ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए।
कांग्रेस ने क्यों उठाया सवाल?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कांग्रेस और विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर पर तीखे सवाल उठाए हैं। कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने कहा कि एससीओ के ज्वाइंट स्टेटमेंट में पहलगाम में हुए आतंकी हमले या पाकिस्तान से संचालित आतंकवाद का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन बलूचिस्तान का उल्लेख किया गया। उन्होंने इसे भारत की कूटनीतिक विफलता करार दिया और कहा कि मोदी सरकार के तहत भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ गया है। इसी तरह, पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने भी कहा कि भारत अब वैश्विक मंच पर पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया है। उन्होंने लिखा कि एससीओ की प्रेस रिलीज में पहलगाम हमले की अनदेखी की गई और बलूचिस्तान का उल्लेख किया गया, जो प्रधानमंत्री की कूटनीतिक विफलता को दर्शाता है। सिन्हा ने यहां तक कह दिया कि प्रधानमंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए।
चीन और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
वहीं चीन और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया भी चर्चा में रही। चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने यह मुद्दा उठाया और चीन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता जांग शाओगिंग से इस पर सवाल पूछा। उन्होंने जवाब में कहा कि जहां तक उन्हें जानकारी है, एससीओ की रक्षा मंत्रियों की बैठक सभी पक्षों के संयुक्त प्रयासों से सफलतापूर्वक संपन्न हुई। पाकिस्तान के थिंक टैंक 'न्यू पाकिस्तान फाउंडेशन' से जुड़े अली के चिश्ती ने एक्स पर लिखा कि असल खबर यह नहीं है कि भारत ने ज्वाइंट स्टेटमेंट पर हस्ताक्षर नहीं किए, बल्कि यह है कि सभी एससीओ सदस्य बलूचिस्तान में कथित भारतीय आतंकवाद की निंदा करने में एकमत हो गए, जिसे उन्होंने पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक जीत बताया।

राजनाथ सिंह ने एससीओ की बैठक में क्या कहा?
एससीओ की बैठक में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत की आतंकवाद के खिलाफ नीति को स्पष्ट रूप से रखा। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती शांति, सुरक्षा और विश्वास की कमी है, और इसकी मुख्य वजह बढ़ती कट्टरता, उग्रवाद और आतंकवाद है। उन्होंने कहा कि शांति और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते और कुछ देश सीमा पार आतंकवाद को एक साधन के रूप में उपयोग कर रहे हैं, जो आतंकवादियों को पनाह भी देते हैं। उन्होंने एससीओ देशों से इस दोहरे रवैये की आलोचना करने और आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील की।
राजनाथ सिंह ने बैठक में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का भी जिक्र किया, जो हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में शुरू किया गया था। उन्होंने बताया कि इस हमले के दौरान पीड़ितों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया था और इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) से जुड़े ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) ने ली थी। उन्होंने कहा कि इस हमले का पैटर्न भारत में एलईटी के पिछले आतंकी हमलों जैसा है और भारत ने यह साफ कर दिया है कि आतंकवाद के केंद्र अब सुरक्षित नहीं हैं और उन्हें निशाना बनाने में भारत को कोई संकोच नहीं है। राजनाथ सिंह ने एससीओ देशों से इस बुराई की खुलकर निंदा करने की मांग की।
क्या है एससीओ?
एससीओ की बात करें तो यह संगठन वर्ष 2001 में चीन, रूस और मध्य एशिया के चार देशों—कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान द्वारा स्थापित किया गया था। भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके सदस्य बने, जबकि ईरान 2023 में इस संगठन में शामिल हुआ। वर्तमान में एससीओ में दुनिया की लगभग 40 फीसदी आबादी रहती है और वैश्विक जीडीपी में इसकी 20 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इस संगठन का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा और राजनीतिक सहयोग को बढ़ाना है।