चंडीगढ़
कभी पंजाब के गांवों में कबड्डी का मतलब ताकत, हिम्मत और गांव की इज्जत हुआ करता था। अखाड़ों में देसी घी, गेहूं की बोरियां, भैंस या ट्रैक्टर इनाम में मिलते थे और जीतने वाला खिलाड़ी पूरे इलाके की शान बन जाता था। लेकिन समय के साथ इस पारंपरिक खेल की तस्वीर बदलती चली गई। आज वही कबड्डी बड़े पैसों, वर्चस्व और हिंसा की चपेट में आ चुकी है।
दर्शकों की बढ़ती संख्या और लोकप्रियता के साथ कबड्डी में पैसा आया। गांवों में होने वाले टूर्नामेंट अब दो-तीन दिन में करोड़ों रुपये खर्च करने लगे हैं। इसी दौर में गैंग्स्टरों की नजर कबड्डी खिलाड़ियों पर पड़ी और धीरे-धीरे यह खेल उनकी ताकत दिखाने का जरिया बन गया। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि कई जगह गैंग्स्टर तय करने लगे हैं कि कौन सा खिलाड़ी किस क्लब से खेलेगा, और विरोध करने वालों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है।
खेल से जुड़े लोगों के अनुसार, कबड्डी खिलाड़ियों की शारीरिक ताकत गैंग्स्टरों को आकर्षित करती है। वे इन खिलाड़ियों के जरिए ग्रामीण इलाकों में अपना प्रभाव मजबूत करना चाहते हैं। यही वजह है कि अन्य खेलों की तुलना में कबड्डी ज्यादा निशाने पर आ गई है।

कबड्डी में बड़े पैमाने पर बदलाव की शुरुआत 2010-11 के आसपास मानी जाती है, जब पहली बार वर्ल्ड कबड्डी कप का आयोजन हुआ और विजेता टीम को एक करोड़ रुपये का इनाम मिला। इसके बाद टीवी कवरेज, बड़े मंच और फिल्मी सितारों की मौजूदगी ने कबड्डी को गांव की चौपाल से निकालकर अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला दी। इसका असर गांवों में होने वाले टूर्नामेंटों पर भी पड़ा और आयोजकों ने इनाम की रकम तेजी से बढ़ा दी।
आज स्थिति यह है कि कपूरथला के भोलाथ जैसे टूर्नामेंटों में महज दो दिनों में साढ़े तीन करोड़ रुपये तक खर्च हो जाते हैं। कई खिलाड़ी एक ही दिन में कई बुलेट मोटरसाइकिलें जीत लेते हैं। अनुमान है कि पंजाब के शीर्ष 30 कबड्डी खिलाड़ी एक सीजन में एक करोड़ रुपये से ज्यादा कमा रहे हैं, जबकि करीब 150 खिलाड़ी 40 से 50 लाख रुपये तक की आमदनी कर रहे हैं।

हालांकि पैसों की इस दौड़ ने खेल के सामने गंभीर चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। अनुभवी खिलाड़ी और आयोजक मानते हैं कि कबड्डी के लिए अब तक कोई मजबूत और एकीकृत व्यवस्था नहीं बन पाई है। डोपिंग जांच, फिटनेस, मैचों की पारदर्शिता और समयबद्ध प्रतियोगिताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। कई बार खिलाड़ी लगातार रात-रात भर खेलने को मजबूर होते हैं, जिससे उनकी सेहत पर असर पड़ता है।
इसके बावजूद कबड्डी की जड़ें आज भी पंजाब के गांवों में मजबूत हैं। यह खेल युवाओं को पहचान, रोजगार और सम्मान देता है। कई इलाकों में बच्चों और महिलाओं के लिए अलग प्रतियोगिताएं भी शुरू की जा रही हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी इससे जुड़ी रहे।
लेकिन इस खेल पर हिंसा का साया लगातार गहराता जा रहा है। वर्ष 2020 से अब तक 12 कबड्डी खिलाड़ी अपनी जान गंवा चुके हैं। हाल के दिनों में मोहाली में राणा बलाचौरिया की हत्या हुई, जबकि इससे पहले लुधियाना, समराला और अन्य इलाकों में गुरविंदर सिंह, तेजपाल, सुखविंदर सिंह सोनी, संदीप सिंह नंगल अंबिया और अरविंदर जीत सिंह पड्डा जैसे नाम सामने आ चुके हैं। इन घटनाओं ने पंजाब की कबड्डी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
