द फॉलोअप डेस्क
एक देश एक चुनाव पर कोविंद कमिटी ने राष्ट्रपति को रिपोर्ट सौंप दिया है। कमेटी ने 18,626 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी हैं। इसमें 9 खंड हैं। इसे तैयार करने में 119 दिनों का वक्त लगा है। गौरतलब है कि 2 सितंबर 2023 को समिति का गठन किया गया था। बाद में हितधारकों, विशेषज्ञों के साथ व्यापक परामर्श करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक कोविंद ने साल 2029 में एक देश एक चुनाव की सिफारिश की है।
The High-Level Committee on simultaneous elections, chaired by Ram Nath Kovind, Former President of India, has met President Murmu at Rashtrapati Bhavan and submitted its report. The Report comprises of 18,626 pages, and is an outcome of extensive consultations with…
— ANI (@ANI) March 14, 2024

क्या है रिपोर्ट में
रिपोर्ट के अनुसार कमेटी ने 2029 से लोकसभा,विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव के लिए एक मतदान सूची रखने की बात रखी है। बता दें कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए अलग सूची होती है। वहीं निकाय चुनाव की बात करें तो इसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग की देख-रेख में सूची तैयार की जाती है। इस रिपोर्ट के पहले चरण में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बारे में बताया गया है। दूसरे चरण में नगरपालिकाओं और पंचायतों को लोकसभा-विधानसभा के साथ इस तरह जोड़ने को कहा गया कि निकायों के चुनावों को लोकसभा और विधानसभा चुनाव के 100 दिनों के अंदर करा लिया जाए।

कौन-कौन है कमिटी में...जानिए
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली इस समिति में गृह मंत्री अमित शाह, राज्यसभा में विपक्ष के पूर्व नेता गुलाम नबी आजाद, वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके सिंह, पूर्व लोकसभा महासचिव सुभाष कश्यप और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे भी शामिल हैं। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को भी समिति का सदस्य बनाया गया था लेकिन, उन्होंने समिति को पूरी तरह से छलावा करार देते हुए मना कर दिया। विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल समिति के विशेष आमंत्रित सदस्य हैं।
क्या है वन नेशन वन इलेक्शन
वन नेशन वन इलेक्शन का मतलब है कि देश में होने वाले सारे चुनाव एक साथ करा लिए जाएं। पूरे देश में एक साथ ही लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव हों। यानी मतदाता लोकसभा और राज्य के विधानसभाओं के सदस्यों को चुनने के लिए मतदाता एक ही दिन, एक ही समय पर अपना वोट डालेंगे। गौतरलब है कि आजादी के बाद कुछ सालों तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ ही होते थे। लेकिन बाद में समय से पहले विधानसभा भंग होने और सरकार गिरने के कारण ये परंपरा टूट गई।
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