डेस्क :
पर्यावरण के मामले में भारत की दशा दयनीय है। ऐसा हम नहीं बल्कि अमेरिका की संस्था की ओर से प्रकाशित एक रिपोर्ट बता रही है। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के मामले में भारत और चीन का प्रदर्शन बहुत खराब है। एक अमेरिकी संस्था ने पर्यावरणीय प्रदर्शन के आधार पर 180 देशों की एक सूची तैयार की है जिसमें भारत को सबसे नीचे रखा गया है। वहीं येल सेंटर फॉर एनवॉरमेंटल लॉ एंड पॉलिसी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंटरनेशनल अर्थ साइंस इंफॉर्मेशन नेटवर्क द्वारा हाल ही में प्रकाशित एनवारमेंटल परफॉरमेंस इंडेक्स (EPI) 2022 में सबसे ऊपर डेनमार्क को रखा गया है।
डेनमार्क के बाद ब्रिटेन और फ़िनलैंड का प्रदर्शन बेहतर
EPI 2022 में सबसे ऊपर डेनमार्क को रखा गया है। डेनमार्क के बाद ब्रिटेन और फिनलैंड है। डेनमार्क, ब्रिटेन और फिनलैंड को हालिया वर्षों में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के चलते ऊपर रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक खतरनाक स्तर पर एयर क्वालिटी और तेजी से बढ़ रहे ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के चलते पहली बार भारत को इस सूची में नीचे रखा गया है।

संस्थान के रिपोर्ट में अमेरिका की भी स्थिति अच्छी नहीं
रिपोर्ट अमेरिका की एक संस्थान ने जारी की हैं। लेकिन ,उस रिपोर्ट में अमेरिका को भी बेहतर नहीं बताया गया है। ईपीआई को 11 इश्यू कैटेगरी में 40 परफॉरमेंस इंडिकेटर्स का इस्तेमाल करते हुए तैयार किया जाता है। क्लाइमेट चेंज परफॉरमेंस, एनवायरमेंटल हेल्थ और इकोसिस्टम विटलिटी के आधार पर 180 देशों की रैंकिंग तय की जाती है। इन इंडिकेटर्स से इसकी जानकारी मिलती है कि कोई देश पर्यावरण के लिए तय नीतिगत लक्ष्यों से अभी कितनी दूर है। 180 देशों में सबसे कम स्कोर भारत (18.9) जबकि म्यांमार (19.4), वियतनाम (20.1) और बांग्लादेश (23.1) ने भी बेहतर प्रदर्शन किया है। पूरी लिस्ट में अमेरिका का नंबर 42वां है ।

ईपीआई प्रोजेक्शन के मुताबिक 2050 तक के लिए ये है अनुमान
ईपीआई प्रोजेक्शन के मुताबिक अगर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का मौजूदा रूझान जारी रहा तो 50 फीसदी से अधिक सिर्फ चार देश चीन, भारत, अमेरिका और रूस से होगा। वर्ष 2050 में चीन को सबसे बड़ा और भारत को दूसरा सबसे बड़ा ग्रीन हाउस उत्सर्जक माना जा रहा है। रिसर्चर्स का यह अनुमान तब है जब हाल ही में उत्सर्जन ग्रोथ रेट में कटौती के लिए इन देशों ने वायदा किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ डेनमार्क और ब्रिटेन जैसे चंद देश ही हैं जो वर्ष 2050 तक ग्रीनहाउस गैस न्यूट्रलिटी की स्थिति में पहुंच सकते हैं जबकि चीन, भारत और रूस जैसे अहम देश तो विपरीत दिशा में बढ़ रहे हैं यानी कि यहां ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है।