द फॉलोअप डेस्क
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) भुवनेश्वर की एक रिसर्च टीम ने पीने के पानी में आर्सेनिक की मिलावट का तेज़ी से और सही-सही पता लगाने में सक्षम एक पोर्टेबल, हाथ में पकड़े जाने वाला डिवाइस बनाया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 'ArsenSafe' नाम का यह इनोवेशन एक गंभीर ग्लोबल और नेशनल पब्लिक हेल्थ खतरे से निपटने के लिए बनाया गया है। इस डिवाइस को 'नैनो सेमीक' (Nano Semic) नाम के एक स्टार्टअप ने बनाया है, जिसके लीडर फैकल्टी मेंबर सायन डे और अक्षय के. हैं। यह स्टार्टअप अभी इंस्टीट्यूट के रिसर्च और एंटरप्रेन्योरशिप पार्क में इनक्यूबेट हो रहा है। इस इनोवेशन में पता लगाने की सटीकता को बेहतर बनाने के लिए एडवांस्ड नैनोटेक्नोलॉजी और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल किया गया है।

काम करने का तरीका
ArsenSafe एक खास सेंसिंग सिस्टम का इस्तेमाल करता है जो रिड्यूस्ड ग्राफीन ऑक्साइड (rGO) और उससे बनी चीज़ों पर आधारित है। यह बहुत कम ट्रेनिंग या बिना किसी मुश्किल सेटअप के आसानी से काम करता है। ओडिशा के लिए अहमियत: यह खोज ओडिशा के लिए खास तौर पर अहम है, क्योंकि सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (CGWB) की एक स्टडी में पहले ही गजपति, गंजाम, भद्रक, केंद्रपाड़ा और जगतसिंहपुर ज़िलों में आर्सेनिक का असुरक्षित स्तर पाया गया था, जो ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) की 0.01 mg/l की सीमा से ज़्यादा था।

ग्लोबल पहचान और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की क्षमता
स्कूल ऑफ़ इलेक्ट्रिकल एंड कंप्यूटर साइंसेज (SECS) में सेंसर्स एंड स्पेक्ट्रोस्कोपी रिसर्च ग्रुप के लीडर सायन डे ने सस्ते और फील्ड में आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने वाले टूल बनाने पर ज़ोर दिया। टीम की इस रिसर्च को - जिसमें अरिजीत पात्रा, बथुला सात्विक और हिमांशु पी. पडोले भी शामिल थे - हाल ही में रॉयल सोसाइटी ऑफ़ केमिस्ट्री के जर्नल 'एनवायरनमेंटल साइंस: नैनो' में इंटरनेशनल पहचान मिली है। जर्नल के एडिटोरियल बोर्ड ने इस पेपर को अपने 'नैनोसेंसिंग' कलेक्शन में शामिल करने के लिए आमंत्रित किया, जिससे यह साबित होता है कि यह वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के सुरक्षा मानकों के अनुरूप है।
