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चहारदीवारी फांद कर शहीदों को नमन करने पहुंचे CM उमर अब्दुल्ला, पुलिस ने की थी रोकने की कोशिश

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द फॉलोअप डेस्क 
13 जुलाई शहीद दिवस पर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला रविवार को श्रीनगर स्थित मजार-ए-शुहदा पहुंचे और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की, लेकिन इस दौरान उन्हें पुलिस और प्रशासन की सख्त रोकटोक का सामना करना पड़ा। सीएम उमर अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि एक दिन पहले उन्हें फातिहा पढ़ने से रोका गया। उन्होंने कहा, “कल सुबह से ही हम सबको नजरबंद कर दिया गया। जब मैंने कंट्रोल रूम को बताया कि मुझे मजार-ए-शुहदा जाना है, तो चंद मिनटों में मेरे घर के बाहर बंकर लगा दिए गए, जो देर रात तक तैनात रहे।”

रविवार को बिना सूचना दिए वे मजार की ओर निकले, लेकिन इस बार भी प्रशासन ने रोकने की कोशिश की। उन्होंने बताया, “मुझे नक्शबंद साहब की दरगाह के मुख्य द्वार से अंदर नहीं जाने दिया गया, मजबूरन मुझे चहारदीवारी फांदनी पड़ी। पुलिस ने मुझे रोकने के लिए शारीरिक बल तक इस्तेमाल किया, लेकिन मैं पीछे नहीं हटा।”
उन्होंने प्रशासन से सवाल किया, “मैं कोई गैरकानूनी काम नहीं कर रहा था, तो फिर किस कानून के तहत मुझे रोका गया? कहते हैं ये आज़ाद देश है, लेकिन हमारे साथ ऐसा सलूक होता है जैसे हम गुलाम हों। हम किसी के गुलाम नहीं, सिर्फ इस ज़मीन के लोगों के सेवक हैं।”


सीएम उमर अब्दुल्ला ने बताया कि उनके झंडे को फाड़ने की भी कोशिश की गई, लेकिन वे मजार तक पहुंचे और फातिहा पढ़ी। “ये क़ब्रें यहीं रहेंगी। हमें 13 जुलाई को रोका गया, लेकिन हमेशा नहीं रोका जा सकता। हम जब चाहें, आएंगे और शहीदों को याद करेंगे।”
ममता बनर्जी ने किया समर्थन
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घटना को लोकतंत्र पर हमला बताया। उन्होंने ट्वीट किया,
“शहीदों के कब्रिस्तान जाने में क्या गलत है? यह न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि एक नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने जैसा है। एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के साथ जो हुआ, वह चौंकाने वाला और शर्मनाक है।” सोशल मीडिया पर सीएम उमर अब्दुल्ला का मजार-ए-शुहदा तक पैदल चलकर जाना, दीवार फांदना और पुलिस से भिड़ना चर्चा का विषय बन गया है। विपक्षी दलों और स्थानीय संगठनों ने इसे प्रशासन की अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली बताया है।

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