द फॉलोअप डेस्क
दो दशक के बाद, 2006 के मालेगांव धमाका केस में सभी 4 आरोपी बरी कर दिये गये है । इस धमाके में 37 लोगों की मौत हो गई थी। बता दें कि इस मामले में पहले के आरोपी भी बरी हो चुके हैं, इसलिए इस केस में अब कोई भी ट्रायल का सामना नहीं कर रहा है। इससे पीड़ितों के परिवारों को कोई इंसाफ नहीं मिल पाया है। चीफ जस्टिस चंद्रशेखर और जस्टिस श्याम चांदक की बेंच ने आरोपियों द्वारा दायर अपील को मंज़ूरी दे दी। इसके साथ ही, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्रवाई पर, फिलहाल रोक लग गई है।

मुस्लिम कब्रिस्तान में हुआ था धमाका
गौरतलब है कि 8 सितंबर, 2006 को हुए ये धमाके नासिक ज़िले के मालेगांव में एक मुस्लिम कब्रिस्तान में हुए थे। ये धमाके शब-ए-बारात के दौरान हुए थे। इस रात मुसलमान माफी के लिए दुआ करते हैं, कुरान पढ़ते हैं और आने वाले साल के लिए बरकत मांगते हैं। बहरहाल, धमाकों के तुरंत बाद, महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) ने 9 मुस्लिम लोगों को गिरफ्तार किया था। हालांकि, 2012 में एक विशेष MCOCA कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी थी। इस केस की शुरुआती जांच ATS ने की थी, जिसे 2007 में CBI को सौंप दिया गया था। उस समय CBI ने राज्य एजेंसी की जांच के नतीजों का समर्थन किया था। जांच में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब NIA ने केस अपने हाथ में ले लिया और चार अलग-अलग आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। NIA ने इन पर एक अलग साज़िश रचने का आरोप लगाया था। बाद में इन चारों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई और हाई कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी।

कोर्ट ने सबूतों और जांच में कमियों पर सवाल उठाए
सुनवाई के दौरान, बचाव पक्ष ने दलील दी कि NIA के केस में अहम सबूतों की कमी है। वकीलों ने बताया कि केस में कोई भी चश्मदीद गवाह नहीं है, न ही कोई ऐसा सामान बरामद हुआ है जो आरोपियों को अपराध से जोड़ता हो। ऐसी फोरेंसिक पुष्टि भी हुई है जो इस दावे को सही ठहराये कि धमाकों में इस्तेमाल होने वाले विस्फोटक कथित जगह पर ही बनाए गए थे। खास बात यह है कि NIA के एक अधिकारी ने अदालत में इस बात की पुष्टि की कि इस मामले में कोई भी चश्मदीद गवाह नहीं था।

इकबालिया बयान और फोरेंसिक जांच सवालों के घेरे में
बचाव पक्ष ने आगे यह तर्क दिया कि इकबालिया बयान, खास तौर पर स्वामी असीमानंद से जुड़े बयान, हैदराबाद की एक विशेष NIA अदालत द्वारा पहले ही खारिज किए जा चुके हैं। इससे अभियोजन पक्ष का सिद्धांत कमज़ोर पड़ गया। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि मध्य प्रदेश की जिस जगह पर कथित तौर पर विस्फोटक तैयार किए गए थे, वहां से लिए गए मिट्टी के नमूनों में RDX के कोई निशान नहीं मिले। इससे आरोपों पर संदेह और भी गहरा गया है।

पीड़ित परिवारों को अब भी जवाबों का इंतज़ार
पीड़ित परिवारों के लिए, यह फैसला उनके मन में लंबे समय से घर कर चुकी अन्याय की भावना को और भी गहरा कर देता है। शफीक अहमद, जिन्होंने इस धमाके में अपने बेटे को खो दिया था, उन्होंने अभियोजन पक्ष की मदद करने के लिए इस मामले में हस्तक्षेप किया था। चारों आरोपियों के बरी हो जाने के बाद, यह मामला अब एक तरह से निराशा पैदा कर रहा है। महाराष्ट्र के सबसे घातक आतंकी हमलों में से एक के लिए अब तक किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया जाना, जांच पर सवाल खड़े करता है।
.jpg)