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सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल डेटा कानून पर केंद्र से मांगा जवाब, अब प्रेस की आजादी और खोजी पत्रकारिता के अस्तित्व पर खतरा 

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल डेटा कानून पर केंद्र से मांगा जवाब, अब प्रेस की आजादी और खोजी पत्रकारिता के अस्तित्व पर खतरा 

द फॉलोअप डेस्क 
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को केंद्र सरकार (Central Government) से एक याचिका (Petition) पर जवाब मांगा है। इस याचिका में कहा गया है कि 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन' (Digital Personal Data Protection) एक्ट (Act) और इसके नियमों (Rules) के प्रावधान प्रेस की आजादी (Press Freedom) और सूचना के अधिकार (Right to Information) का उल्लंघन (Violation) करते हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India-CJI) के साथ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच (Bench) ने यह नोटिस (Notice) जारी किया। इससे पहले उन्होंने 'डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन' (Digital News Publishers Association) की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ वकील (Senior Advocate) माधवी दीवान की दलीलें (Arguments) सुनीं।

21 न्यूज़ पब्लिशर्स के समूह ने कानून को कोर्ट में चुनौती दी है

सोमवार की रिपोर्ट के अनुसार, 21 न्यूज़ पब्लिशर्स के एक समूह ने इस प्राइवेसी कानून को कोर्ट में चुनौती दी है। इनमें मुकेश अंबानी और गौतम अडानी की कंपनियों से जुड़े पब्लिशर्स भी शामिल हैं। उनका तर्क है कि यह कानून खोजी पत्रकारिता (investigative journalism) को खत्म कर देगा और सरकार को पत्रकारों के सूत्रों (sources) का पता लगाने का मौका दे देगा। मंगलवार की सुनवाई के दौरान माधवी दीवान ने कहा, "यह शायद 'लेगेसी मीडिया' (पारंपरिक मीडिया) की ओर से दायर की गई पहली व्यापक याचिका है। 


किसी एक व्यक्ति की मर्जी पर निर्भर होना होगा

उन्होंने सवाल किया, "अगर मुझे पूरी तरह से उस व्यक्ति (जिसका डेटा है, यानी फोटो, वीडियो, व्हाएस आदि) की मर्ज़ी पर निर्भर रहना पड़े कि वह सहमति देगा या नहीं, तो फिर न्यूज़ रिपोर्टिंग कैसे होगी?" वरिष्ठ वकील ने ज़ोर देकर कहा कि इन शर्तों का टेलीविज़न पत्रकारिता और समय-संवेदनशील (time-sensitive) रिपोर्टिंग पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा, "टेलीविज़न पर तो सब कुछ लाइव होता है, या फिर खबर एकदम ताज़ा होनी चाहिए।" उन्होंने आगे कहा कि इन प्रावधानों की वजह से न्यूज़रूम पूरी तरह बंद हो सकते हैं। उन्होंने पूछा, "अगर मुझे हर बार अनुमति और सहमति मांगनी पड़े, तो फिर काम करने का क्या मतलब रह जाएगा?"

अधिकारियों से जुड़ी जानकारी तक पहुंच सीमित हो जायेगी 
याचिका में 'सूचना का अधिकार' (RTI) कानून की धारा 8(1)(j) में किए गए संशोधन को भी चुनौती दी गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि इस बदलाव से सरकारी अधिकारियों से जुड़ी जानकारी तक पहुंच सीमित हो गई है और जनता की निगरानी (public scrutiny) के लिए उपलब्ध जानकारी का दायरा भी बदल गया है। दीवान ने कहा कि धारा 8(1)(j) को हटाए जाने से समाचार की पूरी अवधारणा ही बदल रही है। याचिका में DPDP अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा जानकारी मांगने की शक्तियों पर भी चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि इन प्रावधानों के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं, जो समाचार संगठनों के कामकाज और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्ट करने की उनकी क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। इस मामले को अन्य लंबित मामलों के साथ 17 नवंबर को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।


 

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