द फॉलोअप डेस्क
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर हुए हमले की कोशिश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि इस घटना पर ज्यादा न्यायिक समय खर्च करना उन लोगों को “अनावश्यक प्रचार” देने जैसा होगा जो पब्लिसिटी के भूखे हैं। अदालत ने हालांकि यह भी कहा कि दीवाली छुट्टी के बाद वह इस पर विचार करेगी कि आरोपी अधिवक्ता के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए या नहीं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह की ओर से की गई मेंशनिंग पर की। सिंह ने आग्रह किया था कि अदालत खुद संज्ञान लेकर 71 वर्षीय वकील राकेश किशोर के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करे, क्योंकि उन्होंने अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं जताया है।

विकास सिंह ने कहा, “बार के गुस्से को दिखाना ज़रूरी है… इस घटना को सोशल मीडिया पर महिमामंडित किया जा रहा है।” इस पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “इसे अपने अंजाम तक पहुंचने दें। इसे उसी अवमानना के साथ खत्म होने दें जिसकी यह हकदार है।” सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी पहले ही अवमानना कार्यवाही के लिए सहमति दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि “यह अदालत की संस्थागत गरिमा पर हमला” है और सोशल मीडिया ऐसे कृत्यों को बढ़ावा दे रहा है।
पीठ ने कहा कि खुद मुख्य न्यायाधीश ने “बड़प्पन” दिखाते हुए इस घटना को नज़रअंदाज़ किया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “मुख्य न्यायाधीश का व्यवहार बेहद उदार रहा है, उन्होंने इसे भूल जाने को कहा — यह उनकी विशालता दिखाता है।”
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत का समय ऐसे मामलों में नहीं जाना चाहिए जब सैकड़ों मुकदमों में लोग अपने मामलों के लिए इंतजार करते हैं। उन्होंने जोड़ा, “हमने इस पर 2-5 मिनट लगा दिए, इसी समय में हम तीन गंभीर मामलों की सुनवाई कर सकते थे।”
पीठ ने चेतावनी दी कि इस मुद्दे को फिर से उठाने से “सोशल मीडिया एल्गोरिद्म” इसे और भुनाएंगे। न्यायमूर्ति बागची ने कहा, “जैसे ही हम कार्यवाही शुरू करेंगे, यह फिर से मोनेटाइज़ हो जाएगा। आज की मेंशनिंग भी सोशल मीडिया पर और फैल जाएगी।”
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा दंड देने से नहीं, बल्कि अपने आचरण से बनती है। “हम अपने व्यवहार से लोगों का सम्मान अर्जित करते हैं — यही भावना मुख्य न्यायाधीश ने दिखाई,” न्यायमूर्तियों ने कहा।
हालांकि विकास सिंह ने दोहराया कि सोशल मीडिया पर घटना को “गौरव” की तरह दिखाया जा रहा है, इसलिए इसे अदालत की अवमानना माना जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “हम एक सप्ताह इंतज़ार करेंगे। अगर मामला बना रहता है, तो दीवाली ब्रेक के बाद सुनवाई होगी।”

इस पर न्यायमूर्ति बागची ने मुस्कराते हुए कहा, “दीवाली तक सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म को कुछ नया मिल जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट 20 अक्टूबर से एक सप्ताह की दीवाली छुट्टी पर रहेगा और 27 अक्टूबर को दोबारा खुलेगा।
यह घटना 6 अक्टूबर को हुई थी जब अधिवक्ता राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश की बेंच की ओर कोई वस्तु फेंकी थी। उस वक्त न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन भी मौजूद थे। सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत किशोर को बाहर ले जाकर हिरासत में लिया, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने केस दर्ज नहीं कराया।
यह सब उस वक्त हुआ जब मुख्य न्यायाधीश के एक धार्मिक टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद चल रहा था। बाद में उन्होंने खुलकर कहा कि वे “सभी धर्मों में विश्वास रखते हैं” और “सच्चे सेक्युलरिज़्म” को मानते हैं।
घटना के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ता राकेश किशोर का लाइसेंस अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है। आदेश में कहा गया है कि उन्होंने Advocates Act, 1961 और Bar Council Rules के पेशेवर आचरण नियमों का उल्लंघन किया है।
