द फॉलोअप डेस्क
झारखंड में 48 नगर निकायों का एक साथ चुनाव संपन्न होने के साथ ही अधिकतर कार्यपालक पदाधिकारी अपने अपने पद से हटने को बेचैन होने लगे हैं। इसके लिए ये अपनी पहुंच और पैरवी के अनुसार गोटी भिड़ाने में भी जुट गए हैं। मालूम हो कि 23 फरवरी को राज्य के 48 नगर निकायों में मतदान की प्रक्रिया संपन्न हुई थी। 27 फरवरी को मतगणना प्रारंभ होने के बाद धनबाद छोड़ अन्य नगर निकायों की मतगणना 28 फरवरी को समाप्त हो गयी थी। उसके बाद 19 मार्च तक निकायों के नव निर्वाचित वार्ड पार्षदों, नगर निगमों के मेयर, नगर परिषद और नगर पंचायतों के अध्यक्ष-उपाध्यक्षों ने पद एवं गोपनीयता की शपथ ले ली। साथ ही डिप्टी मेयर के चुनाव की प्रक्रिया समाप्त होते ही, सभी नव निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने अपना अपना कार्यभार भी संभाल लिया। अब नव निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के कार्यभार संभालते ही कार्यपालक पदाधिकारी संबंधित निकाय के मेयर या अध्यक्ष के साथ अपना सेटिंग बैठाने में जुट गए हैं या वहां से रुख्सत होने रास्ता तलाश रहे हैं।
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कार्यपालक पदाधिकारी पद से हटने को क्यों हो रहे परेशान
यहां मालूम हो कि 2020 में राज्य के दो नगर निगमों, छह नगर परिषदों और पांच नगर पंचायतों समेत कुल 13 नगर निकायों का कार्यकाल समाप्त हो गया था। उसके बाद 2023 में रांची, मेदिनीनगर, चास, गिरिडीह समेत अन्य नगर निगमों का कार्यकाल भी समाप्त हो गया। जैसे जैसे कार्यकाल समाप्त होता गया राज्य सरकार ने झारखंड नगरपालिका अधिनियम 2011 के तहत उस निकाय की जिम्मेदारी कार्यपालक पदाधिकारियों को सौंपती गयी। उस समय से संबंधित नगर निकायों में कार्यपालक पदाधिकारी के पद पर बैठे अधिकारियों ने जमकर पावर इंजॉय किया। निकायों में होनेवाले विकास के कामों में इनकी भूमिका सर्वोपरि रही। क्योंकि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के नहीं रहने के कारण योजनाओं के सूत्रण से लेकर उनके कार्यान्वयन और भुगतान में इनकी ही चली। उन पर जनप्रतिनिधियों का दबाव बहुत ही कम रहा। पूरे निकाय क्षेत्र में वे हर तरह से पावरफुल बने रहे। पावर और पैसा इंज्वॉय किए। लेकिन नगर निगमों के मेयर और नगर परिषद तथा नगर पंचायतों के अध्यक्ष उपाध्यक्ष द्वारा पदभार ग्रहण करते ही, वे उन्हीं प्रमुख विषयों पर ध्यान देने लगे हैं, जिस पर कार्यपालक पदाधिकारी कुंडली मार बैठे थे। इससे टकराव की स्थिति और भविष्य में कार्यपालक पदाधिकारियों के भ्रष्टाचार के उजागर होने की संभावना बनने लगी है। यही कारण है कि सेटिंग न बैठते देख अधिकतर भागने को बेताव हैं।

कोई तीन साल तो कोई पांच पांच साल से जमा है
13 नगर निकायों का कार्यकाल 2020 में समाप्त हुआ था। उसके बाद 2023 में लगभग 30 निकायों का कार्यकाल समाप्त हुआ। कार्यकाल समाप्त होने के बाद जिन कार्यपालक पदाधिकारियों की पोस्टिंग हुई, उनमें कई तीन साल तो कई पांच साल से उसी निकाय में जमे हैं। निकाय चुनाव नहीं होने के कारण वे वहां से हटना भी नहीं चाह रहे थे। लेकिन अब परिस्थिति अलग है। जिस तरह नगर निकाय चुनाव में बेहताशा खर्च हुआ है और डिप्टी मेयर के चुनाव में बोली लगी है, उसके बाद निकायों का परिदृश्य और भी बदलना तय है। तनाव और भ्रष्टाचार का एक साथ प्रभाव पड़ने वाला है।