logo

सिब्बल को मरांडी का पत्र : आपको न्यायालय का मनोनकूल फैसला न्यायिक और प्रतिकूल में राजनीति क्यों दिखायी देती है

आपको न्यायालय का मनोनकूल फैसला न्यायिक और प्रतिकूल में राजनीति क्यों दिखायी देती है

द फॉलोअप डेस्क, रांची
प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने अधिवक्ता कपिल सिब्बल को एक पत्र लिखा है। उसमें मरांडी ने कहा है-आपकी वरिष्ठता, विधिक अनुभव और सार्वजनिक जीवन में आपकी हैसियत का सम्मान करता हूं, लेकिन आपकी हैसियत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह संविधान और सर्वोच्च न्यायालय से बड़ी नहीं हो सकती। मरांडी ने कपिल सिब्बल को याद दिलाया है कि 21 फ़रवरी 2024 भी मैंने आपको इसी प्रवृत्ति के संबंध में विस्तृत पत्र लिखा था। तब भी मेरी आपत्ति यही थी कि मनोनुकूल फैसला आने पर आपको न्यायिक व्यवस्था उचित लगती है, लेकिन प्रतिकूल स्थिति में न्यायालय के निर्णयों में राजनीति दिखाई देने लगती है। उम्मीद थी कि आप मेरे उस पत्र का उत्तर देंगे या फिर अपना भूल सुधार जैसा काम ज़रूर करेंगे। पर उस पत्र के दो वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद भी आपके सार्वजनिक आचरण में वही प्रवृत्ति दिखाई दे रही है।

मरांडी ने आगे लिखा है-आपने अब सर्वोच्च न्यायालय पर भरोसा खोने की बात कही और उसी न्यायालय में उपस्थित होकर दलीलें भी रखीं। आखिर जनता इस विरोधाभास का क्या अर्थ निकाले ? आपका भरोसा न्यायिक प्रक्रिया पर है या केवल अपने मनमाफिक परिणाम पर ? जब बात आपके अनुकूल नहीं होती, तो क्या आपका अहंकार इतना आहत हो जाता है कि आप सीधे सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर उंगली उठाने लगते हैं ? क्या आप चाहते हैं कि आप जो कहें, अदालत वही मान ले ? आपकी दलील स्वीकार हो तो न्याय और स्वीकार न हो तो न्यायपालिका से विश्वास समाप्त - यह कैसी कसौटी है ? सर्वोच्च न्यायालय संविधान से चलता है, किसी वरिष्ठ अधिवक्ता की इच्छा, प्रतिष्ठा या दबदबे से नहीं।

चाहता तो मैं भी आपके विरुद्ध एससी-एसटी का केस कर सकता था

आपके आचरण पर मेरी आपत्ति व्यक्तिगत अनुभव से भी जुड़ी है। आपने हेमंत सोरेन के साथ अपने पॉडकास्ट में मेरे विरुद्ध चार पीएमएलए मामले होने और इसके बावजूद ईडी द्वारा मुझे समन नहीं भेजे जाने का दावा किया था। मैंने 23 फ़रवरी 2024 को सार्वजनिक रूप से उसका खंडन करते हुए स्पष्ट किया था कि मेरे विरुद्ध दर्ज मुकदमे जनांदोलनों से जुड़े हैं और उनमें कोई भी ‘प्रेडिकेट ऑफेन्स’ का मामला नहीं है। वे लगभग सारे मामले एक एक कर न्यायालय में धराशायी हो गये। किसी भी मामले में कोई चार्ज शीट तक नहीं हुआ। आप जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता से इतनी बुनियादी तथ्यपरकता की अपेक्षा तो की ही जा सकती है। अपने मुवक्किल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए मेरे विरुद्ध ऐसे निराधार दावे करना किस पेशेवर मर्यादा का परिचायक है ? गलत एवं भ्रामक जानकारी परोस कर मुझे बदनाम करने की कोशिश के लिए मैं चाहता तो ठीक उसी तरह एससी/एक्ट का सहारा लेकर आप पर मुक़दमा कर सकता था, जिस तरह कि हेमंत सोरेन ने अपने बचाव में ईडी अधिकारियों के विरूद्ध एससी/एसटी एक्ट का सहारा लिया और ये संभवतः आप जैसे विद्वान आदमी की सलाह पर ही हुआ होगा। आप उस मामले की न्यायालय में भारी भरकम मोटी रकम की फ़ीस ले लेकर पैरवी भी कर रहे होंगे। पर मेरा यह मत है कि अगर मैं या हेमंत सोरेन जैसा उच्च सुरक्षा सुविधा प्राप्त व्यक्ति भी अगर खुद इस क़ानून का सहारा लेकर खुद का बचाव करने लगें तब तो वो दिन दूर नहीं जब इस क़ानून की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जायेगी और ये काम कम से कम मैं तो नहीं कर सकता। हमें तो आशंका है कि राजनैतिक विरोधियों से निपटने के लिये शायद आप जैसे विद्वान आदमी की सलाह पर ही हेमंत सोरेन ने खुद एवं खुद की सरकार में एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग का रिकार्ड ही क़ायम कर दिया है।

आपको अपने दोहरे मानदंड पर भी बोलना चाहिए
बाबूलाल मरांडी ने पत्र में आगे लिखा है-सिब्बल जी, झारखंड की जनता आपकी भूमिका से भलीभांति परिचित है। राज्य सरकार आपकी महंगी पैरवी लेती रही है। डीजीपी नियुक्ति के जिस नियम पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय से प्रथमदृष्टया टकराव का प्रश्न उठाया, उसी मामले में आप राज्य सरकार का पक्ष रख रहे हैं। सरकार अपने गैरकानूनी फैसलों और मनमानी को बचाने के लिए आपकी पैरवी को ढाल बना रही है। जनता के पैसों से ऐसे फैसलों का बचाव करने वाले आप बाहर आकर संस्थाओं की मर्यादा पर भाषण देते हैं। इस दोहरे मापदंड का उत्तर भी  आपको देना चाहिए।

जनता को बताएं कि 2020 से अब तक आपने हेमंत सरकार से कितनी राशि ली

अपने पिछले पत्र में मैंने आपसे पूछा था कि जनवरी 2020 से झारखंड सरकार और संबंधित मामलों की पैरवी में आपने तथा आपकी टीम ने फीस, सलाह और चार्टर्ड विमान के खर्च के मद में कितनी राशि प्राप्त की। मैंने यह भी पूछा था कि गरीब और असहाय आदिवासी परिवारों को बिना फीस लिए न्याय दिलाने के लिए आप कितना आगे आए हैं। आज मैं उन प्रश्नों को फिर आपके समक्ष रख रहा हूं। हमें तो लगता है कि झारखंड सरकार एवं हेमंत सोरेन के ग़लत कार्यों के मामलों में आप ग़रीबों की गाढ़ी कमाई वाले राजस्व में से झारखंड के ख़ज़ाने से जितना ले चुके होगें उससे तो ग़रीब/दलित/आदिवासियों की कई कॉलोनियां बनाई जा सकती थी।

आप अपने पॉडकास्ट में केवल विपक्षी नेताओं को ही क्यों बुलाते हैं

यदि न्यायिक प्रक्रिया, न्यायाधीशों और अपने ही विधि समुदाय की संस्थागत गरिमा का सम्मान आपके लिए इतना सशर्त है, तो इसी व्यवस्था को अपनी कमाई का इतना बड़ा जरिया क्यों बनाए हुए हैं ? जिस व्यवस्था से प्रतिष्ठा और आय अर्जित करते हैं, उसकी विश्वसनीयता पर प्रहार करते समय अपनी जिम्मेदारी क्यों भूल जाते हैं ? आप अपने पॉडकास्ट में केवल विपक्षी नेताओं को मंच देते हैं। चुन-चुनकर विपक्षी नेताओं से अपने अनुकूल राजनीतिक नैरेटिव तैयार कराने के बाद आप उसी नैरेटिव को संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता की कसौटी बना देते हैं। क्या केवल वही संस्था निष्पक्ष है जो आपके राजनीतिक निष्कर्षों पर मुहर लगाए ? सर्वोच्च न्यायालय आपके पॉडकास्ट का मंच नहीं है, जहाँ चर्चा आपकी तय की हुई दिशा में चले। वहाँ आपकी दलीलों की जाँच होगी, उनसे असहमति भी होगी और निर्णय आपकी इच्छा के विरुद्ध भी आ सकता है। इतने लंबे विधिक अनुभव के बाद यह बात आपको सबसे अधिक समझनी चाहिए।

स्पष्ट कीजिए आप क्या हैं, नेता, वकील या पॉडक्साटर

बेहतर होगा कि आप अपनी भूमिका स्पष्ट करें - नेता रहिए, वकील रहिए या पॉडकास्टर बनिए। नेता के रूप में आरोप लगाएँ तो उनकी जवाबदेही लीजिए। वकील के रूप में पैरवी करें तो प्रतिकूल निर्णय का भी सम्मान कीजिए। पॉडकास्टर बनें तो अपने राजनीतिक पक्ष को निष्पक्षता का प्रमाणपत्र मत दीजिए और अगर हिम्मत है तो परस्पर विरोधी विचारधारा वालों को भी अपने पोडकास्ट में बुलाकर उनकी बातों को भी प्रमुखता से रखिये। लेकिन आप ऐसा करेंगे नहीं। क्योंकि हमें तो आशंका है कि चुके आपका समय क़ीमती है। उसके लिये मिनट के हिसाब से फ़ीस लेते होगें तो आप पाडकास्ट के लिये भी क्लांइट का चुनाव और समय देने के लिये भी शायद इसकी भी फ़ीस लेते होंगे ?
एक भूमिका में राजनीतिक माहौल बनाना, दूसरी भूमिका में उसकी पैरवी करना और मनचाहा परिणाम न मिलने पर पूरी न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा कर देना - यह आचरण गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

 


हूं।
 

Tags - Babulal Marandi Kapil Sibal Jharkhand Hemant Soren