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सत्ता और सचिवालय का सच : किसकी किस्मत में सीएमओ?

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जीतेंद्र कुमार
हाल में ब्यूरोक्रेसी में भारी पैमाने पर तबादले हुए। कई जिलों के डीसी बदल दिए गए। सीएमओ से भी राजीव रंजन को जमशेदपुर भेज दिया गया। इसके बाद सीएमओ में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के पदस्थापन को अनिवार्य माना जा रहा है। क्योंकि मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव अविनाश कुमार मुख्य सचिव भी हैं। इस कारण उन पर काम का लोड अचानक कुछ ज्यादा बढ़ गया है। इस मौके को देख ब्यूरोक्रेसी में सीएमओ में घुसने की कोशिशें शुरू हो गयी है। अपने अपने तरीके से अखिल भारतीय सेवा के कुछ अधिकारी, जिन्हें आईएएस भी कहते हैं, सीएमओ में पहुंच जाने की तरकीब बिठाने लगे हैं। बताया जा रहा है कि राज्य के एक प्रमुख जिले के डीसी और कोर डिपार्टमेंट के सचिव, इस दौड़ में सबसे आगे हैं। उन्हें मुख्यमंत्री से अपने नजदीकी संबंधों के आधार पर वहां तक पहुंच जाने का विश्वास भी है। लेकिन मुख्यमंत्री का विश्वास किस पर है, इस पर सबकी पैनी नजर है।


सत्ता के गलिायरे में इसकी चर्चा भी होने लगी है। कई तर्क भी दिए जा रहे हैं। पहला तो पिछले दिनों कई जिलों के उपायुक्तों के हुए तबादले के बाद कुछ अधिकारी अभी भी वेटिंग फॉर पोस्टिंग में है। इसलिए जल्द ही ब्यूरोक्रेसी में एक और बदलाव होगा, इसे सुनिश्चित माना जा रहा है। इसी क्रम में किसी विश्वसनीय आईएएस की इंट्री सीएमओ में भी होगी, यह भी अपरिहार्य समझा जा रहा है। उसी मौके की तलाश में ये अधिकारी जुट गए हैं। लेकिन परेशानी का सबब यह है कि विश्वास पात्र केवल साहब और छोटे साहब के हो जाने भर से गोटी लाल नहीं हो पा रहा है। सीएमओ में घुसने के लिए कई लोगों का विश्वास पात्र होना पहली शर्त है। क्योंकि किसी अधिकारी के नाम पर किसी की सहमति है तो दूसरा उसका विरोधी है। किसी को अपनी विश्वनीयता में नयी इंट्री से दरार आने की आशंका है तो किसी को सेट सिस्टम के डिरेल्ड होने खतरा महसूस हो रहा है। अब देखना है कि बड़े साहब का पसंदीदा कौन बनता है। किसको झटता और किसको बल मिलता है।

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