जीतेंद्र कुमार, रांची
झारखंड को जल्द नया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मिलेगा। नये प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के चयन को लेकर गतिविधि तेज है। दावेदार भी लगातार दिल्ली दौड़ रहे हैं। आलाकमान राज्य के सामाजिक, धार्मिक और जातीय समीकरणों का गुणा-भाग शुरू कर दिया है। मशविरा और बातचीत का दौर अंतिम चरण में बताया जा रहा है। पार्टी का मानना है कि 2029 में होने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव की दृष्टि से अब नये प्रदेश अध्यक्ष के चयन में विलंब करना बहुत फ्रूटफूल नहीं होगा। क्योंकि नये अध्यक्ष को भी अपनी टीम बनाने, संगठन को धार देने और मतदाताओं के बीच पैठ बढ़ाने के लिए कुछ वक्त देना जरूरी होगा। हर्डल मात्र यूपी और पंजाब है। वहां विधानसभा के चुनाव होने हैं। कांग्रेस के लिए इन दोनों राज्यों में संगठन को दुरुस्त करना पहली प्राथमिकता है। वैसे भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष केशव महतो कमलेश किसी के लिए बहुत अधिक परेशानी के शबब नहीं हैं। इसलिए यूपी और पंजाब से निबटने के साथ ही कांग्रेस का फोकस झारखंड पर होगा। इसलिए प्रदेश अध्यक्ष पद की इस दौर में दौड़ रहे कई नेताओं के नाम एक साथ गिनाए जा रहे हैं। उनमें अल्पसंख्यक और फॉरवर्ड फिलहाल पार्टी की प्राथमिकता में नहीं हैं। वर्तमान राजनीतिक दौर में आदिवासी-क्रिश्चियन और ओबीसी समुदाय का पलड़ा ज्यादा भारी बताया जा रहा है।
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क्यों लिया जा रहा बंधु तिर्की, राजेश कच्छप और कालीचरण सिंह मुंडा का नाम
एसटी कोटे से प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पहला नाम पूर्व मंत्री बंधु तिर्की का लिया जा रहा है। उनकी पहुंच, पैरवी, प्रयास और प्रभाव का जोड़-घटाव भी हो रहा है। पहले से बंधु तिर्की किसी पहचान के मोहताज नहीं है। वह सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। हाल में मोरहाबादी मैदान में हुए आदिवासी महाजुटान रैली की सफलता ने बंधु तिर्की को मजबूती भी दी है। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से पार्टी के ईसाई कोर वोटर को जोड़ने में मजबूती मिलने से इंकार भी नहीं किया जा सकता। आदिवासी क्रिश्चियन होने के कारण, सरना आदिवासियों को जोड़ने में भी उनकी भूमिका बहुत हद तक कामयाब हो सकती है। मुसलिम समुदाय के बीच भी उनकी छवि ठीक-ठाक है। सरना आदिवासी समुदाय से आनेवाले सांसद सुखदेव भगत को पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाए जाने से उनका एक और कांटा निकल गया है। लेकिन सबसे बड़ा रोड़ा उनकी पुत्री शिल्पी नेहा तिर्की बनी बैठी है। पुत्री को मंत्री और पिता को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने से एक ही परिवार के प्रभाव पार्टी के चले जाने का लगने वाला आरोप, बंधु तिर्की के लिए सबसे बड़ी मुसीबत है। एसटी कोटे से खिजरी के विधायक और विधानसभा में विधायक दल के उप नेता राजेश कच्छप भी प्रबल दावेदार हैं। सरना आदिवासी समुदाय से आनेवाले राजेश कच्छप पर पार्टी की भी नजर है। युवा होने के साथ साथ अब उनमें संगठन की समझ भी विकसित हो गयी बतायी जा रही है। हालांकि चर्चा के क्रम में खूंटी के सांसद कालीचरण सिंह मुंडा का भी नाम लिया जा रहा है। क्योंकि बिहार से अलग हटकर पहली बार बनी झारखंड क्षेत्रीय कांग्रेस पार्टी के पहले अध्यक्ष, उनके पिता टी मुचिराय मुंडा ही थे। इसलिए पिता का प्रभाव हमेशा उनके ऊपर साये की तरह रहा है। लेकिन जानकार उनके नाम की चर्चा ज्यादा और दावेदारी में दम कम बता रहे हैं।

बन्ना की राह काटने में लगी है अंबा
आदिवासी कोटे के बाद अध्यक्ष पद की प्रतिस्पर्द्धा में ओबीसी समुदाय सबसे ऊपर है। इस समुदाय में पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता का नाम प्रमुख है। कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं में शुमार होने के अलावा, पार्टी में उनकी पारी भी लंबी रही है। संगठन और सरकार की समझ के अलावा प्रभाव डालने वाले वक्ताओं में भी उनकी गिनती होती है। किसी खास समुदाय का उनके प्रति कोई गहरी नाराजगी जैसी बात भी, उनके साथ नहीं है। हालांकि बन्ना की दावेदारी में अंबा जरूर टांग अड़ा रही है। अपने संबंध और संपर्कों के माध्यम से वह दिल्ली में अपनी उम्मीदवारी को बल देने में जुटी है। लेकिन जानकार इन दोनों ओबीसी नेताओं में बन्ना गुप्ता को कहीं भारी बता रहे हैं।
फॉरवर्ड और अन्य विकल्प
वैसे धीमें स्वर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर फॉरवर्ड कास्ट से भी कुछ नेताओं के नाम लिए जा रहे हैं। उनमें पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर का नाम एक बार फिर लिया जा रहा है। लेकिन राजेश ठाकुर अब प्रदेश की जगह राष्ट्रीय राजनीति करना अपने कैरियर के लिए बेहतर मानते हैं। उसके बाद फॉरवर्ड और बैकवर्ड कास्ट के मिश्रण के रूप में दीपिका पांडेय सिंह भी नाम लिया जा रहा है। हालांकि खुद दीपिका पांडेय मंत्री पद छोड़ कर प्रदेश अध्यक्ष पद की कुर्सी को महत्व नहीं देती हुई बतायी जा रही है। इस कारण दीपिका पांडेय सिंह का नाम उछानेवालों में उनके विरोधी की भूमिका ज्यादा है, जो चाहते हैं कि मंत्री पद रिक्त हो, नये सिरे से मंत्रिमंडल का गठन हो और उसमें नये लोगों को जगह मिले। पार्टी के कद्दावर मुसलिम लीडर आलमगीर आलम के आय से अधिक संपत्ति मामले में बुरी तरह फंस जाने की वजह से पार्टी नजर किसी दूसरे अल्पसंख्यक नेता पर टिक ही नहीं पा रही है।
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