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जामताड़ा : "साहब! चप्पलें घिस गईं, पर गांव में बिजली नहीं आई", जामताड़ा में छलका ग्रामीणों का दर्द

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जामताड़ा: 

साहब, अब तो हमारी सुन लीजिए! दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते हमारे पैरों की चप्पलें तक घिस गई हैं, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।" यह मार्मिक गुहार जामताड़ा प्रखंड के आदिवासी बहुल गांव बेलटांड़ के ग्रामीणों ने जिला मुख्यालय पहुंचकर लगाई। बुधवार को ग्रामीण अपनी मूलभूत समस्याओं को लेकर उपायुक्त (DC) को ज्ञापन सौंपने पहुंचे थे।

​आजादी के दशकों बाद भी अंधेरे में 25 परिवार
​ग्रामीण वकील मरांडी, साहेब लाल मरांडी और महादेव मरांडी ने बताया कि गांव के करीब 25 घर आज भी ऐसे हैं, जिन्होंने आज तक बिजली का बल्ब जलते नहीं देखा। वहीं, गांव के जिस हिस्से में बिजली है भी, वहां लो-वोल्टेज की समस्या इतनी गंभीर है कि बिजली होने न होने के बराबर है। ग्रामीणों का कहना है कि शाम ढलते ही पूरा गांव अंधेरे के आगोश में समा जाता है, जिससे जंगली जानवरों का डर बना रहता है।

वादे अनेक पर समाधान शून्य
ग्रामीणों ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि साल 2025 में स्थानीय विधायक से मिलकर गुहार लगाई गई थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। बिजली विभाग के अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाकर ग्रामीण थक चुके हैं। 8 अप्रैल 2026 को भी उपायुक्त और मुख्यमंत्री को आवेदन दिया गया था, पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।

बच्चों की पढ़ाई और पानी का संकट
​बिजली न होने का सबसे बुरा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। ढिबरी और मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई करना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ साबित हो रहा है। इसके साथ ही, ग्रामीणों ने पेयजल की घोर किल्लत का मुद्दा भी उठाया। ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस बार डीसी उनकी सुध लेंगे और बेलटांड़ के आदिवासी परिवारों को अंधेरे से मुक्ति मिलेगी। सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच बेलटांड़ के ग्रामीणों का यह संघर्ष व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस बार ग्रामीणों की चप्पलें और उम्मीदें टूटने से बचा पाता है या नहीं।

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